श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 8: राजा परीक्षित द्वारा पूछे गये प्रश्न  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
योगेश्वरैश्वर्यगतिर्लिङ्गभङ्गस्तु योगिनाम् ।
वेदोपवेदधर्माणामितिहासपुराणयो: ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
योग-ईश्वर—योग शक्तियों के स्वामी का; ऐश्वर्य—ऐश्वर्य; गति:—प्रगति; लिङ्ग—सूक्ष्म शरीर; भङ्ग:—विरक्ति; तु—लेकिन; योगिनाम्—योगियों का; वेद—दिव्य ज्ञान; उपवेद—वेदों का अप्रत्यक्ष ज्ञान; धर्माणाम्—धर्मशास्त्रों का; इतिहास—इतिहास; पुराणयो:—पुराणों का ।.
 
अनुवाद
 
 महान् योगियों के ऐश्वर्य क्या हैं और उनकी परम गति क्या है? पूर्ण योगी किस प्रकार सूक्ष्म शरीर से विरक्त होता है? इतिहास की शाखाओं तथा पूरक पुराणों समेत वैदिक साहित्य का मूलभूत ज्ञान क्या है?
 
तात्पर्य
 योगेश्वर आठ प्रकार की सिद्धियाँ प्रदर्शित कर सकता है, जिनमें परमाणु से भी सूक्ष्म बनना या पंख से भी हल्का होना, इच्छानुसार वस्तु को प्राप्त करना और जहाँ भी इच्छा हो चले जाना, आकाश में किसी लोक का निर्माण करना इत्यादि कृत्य सम्मिलित हैं। ऐसे अनेक योगेश्वर हैं, जो ऐसी भिन्न-भिन्न सिद्धियों में दक्ष होते हैं, किन्तु इनमें से सर्वश्रेष्ठ हैं शिवजी। शिवजी सर्वश्रेष्ठ योगी हैं और सामान्य जीवों से कहीं बढक़र अद्भुत कार्य करने वाले हैं। भगवद्भक्त योग शक्तियों का प्रत्यक्ष रूप से अभ्यास नहीं करते, किन्तु भगवत्कृपा से वे दुर्वासा मुनि जैसे महान् योगेश्वर को परास्त कर सकते हैं, जो महाराज अम्बरीष से झगड़ा मोल लेकर उन्हें अपनी योगशक्ति की अद्भुत उपलब्धियाँ दिखाना चाहते थे। महाराज अम्बरीष भगवान् के शुद्ध भक्त थे, अत: भगवान् ने अम्बरीष महाराज द्वारा किसी प्रयास के बिना ही उन्हें योगेश्वर दुर्वासा मुनि के रोष से बचा लिया और मुनि को राजा से क्षमा माँगनी पड़ी। इसी प्रकार जब द्रौपदी को कुरु लोग मिलकर भरी सभा में नग्न करके देखना चाह रहे थे, तो भगवान् ने इस संकट की घड़ी में अशेष साड़ी प्रदान करके रक्षा की थी और द्रोपदी को तो किसी योगशक्ति का ज्ञान भी नहीं था। अत: भगवान् की असीम शक्ति के बल पर भक्त भी योगेश्वर होते हैं, ठीक उसी तरह जिस प्रकार बालक अपने माता-पिता की शक्ति से शक्तिशाली बनता है। वे किसी कृत्रिम उपाय से अपनी रक्षा नहीं करते, किन्तु माता-पिता के अनुग्रह से बच जाते हैं। महाराज परीक्षित ने ब्राह्मणश्रेष्ठ शुकदेव गोस्वामी से ऐसे महान् योगियों के परम गन्तव्य के विषय में अथवा वे जिस प्रकार अपने प्रयासों से या भगवत्कृपा से ऐसी अद्वितीय शक्तियाँ प्राप्त करते हैं, उसके विषय में भी प्रश्न किये। उन्होंने सूक्ष्म तथा स्थूल भौतिक शरीर से उनकी विरक्ति के विषय में भी प्रश्न किये। उन्होंने वैदिक ज्ञान के सार के विषय में भी जिज्ञासा प्रकट की। जैसाकि भगवद्गीता (१५.१५) में कहा गया है, समस्त वेदों का सार पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को जानना और इस प्रकार भगवान् का दिव्यरुप प्रिय दास बनना है।
 
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