श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 8: राजा परीक्षित द्वारा पूछे गये प्रश्न  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक
यो वानुशायिनां सर्ग: पाषण्डस्य च सम्भव: ।
आत्मनो बन्धमोक्षौ च व्यवस्थानं स्वरूपत: ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो सब; वा—अथवा; अनुशायिनाम्—भगवान् के शरीर में समाहित; सर्ग:—सृष्टि; पाषण्डस्य—पाखंडियों का; च— तथा; सम्भव:—प्राकट्य; आत्मन:—जीवों का; बन्ध—बद्ध; मोक्षौ—मुक्त हुए; च—भी; व्यवस्थानम्—स्थित हुए; स्व रूपत:—मुक्त अवस्था में ।.
 
अनुवाद
 
 कृपया यह भी समझाएँ कि भगवान् के शरीर में समाहित जीव किस प्रकार उत्पन्न होते हैं और पाखंडीजन किस तरह इस संसार में प्रकट होते हैं? यह भी बताएँ कि किस प्रकार अबद्ध जीवात्माएँ विद्यमान रहती हैं?
 
तात्पर्य
 भगवान् के प्रगतिशील भक्त को प्रामाणिक गुरु से पूछना चाहिए कि सृष्टि के समय भगवान् के शरीर में समाहित जीवात्माएँ किस प्रकार वापस आती हैं। जीवात्माएँ दो प्रकार की होती हैं—नित्यमुक्त जीव तथा नित्यबद्ध जीव। नित्यबद्ध जीव के भी दो प्रकार हैं—आज्ञाकारी तथा अवज्ञाकारी। आज्ञाकारी जीव के पुन: दो भेद हैं—भक्त तथा चिन्तक। चिन्तक भगवान् के शरीर से तादात्म्य चाहते हैं जबकि भक्त अपनी पृथक् सत्ता बनाये रखकर भगवान् की सेवा में निरन्तर लगे रहना चाहते हैं। ऐसे भक्त जो पूर्ण रूप से शुद्ध नहीं होते तथा ज्ञानमार्गी दार्शनिक अगली सृष्टि में और अधिक शुद्धिकरण के लिए पुन: बद्ध हो जाते हैं। ऐसे बद्धजीव भगवान् की भक्ति में प्रगति के साथ मुक्त हो जाते हैं। महाराज परीक्षित ने ये सारे प्रश्न अपने गुरु से पूछे जिससे वह तत्त्व-ज्ञान में निष्णात हो सकें।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥