श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 8: राजा परीक्षित द्वारा पूछे गये प्रश्न  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक
अत्र प्रमाणं हि भवान् परमेष्ठी यथात्मभू: ।
अपरे चानुतिष्ठन्ति पूर्वेषां पूर्वजै: कृतम् ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
अत्र—इस विषय में; प्रमाणम्—प्रमाण; हि—निश्चय ही; भवान्—आप; परमेष्ठी—ब्रह्मा, ब्रह्माण्ड का स्रष्टा; यथा—जिस प्रकार; आत्म-भू:—सीधे भगवान् से उत्पन्न; अपरे—अन्य लोग; च—केवल; अनुतिष्ठन्ति—केवल अनुकरण करने के लिए; पूर्वेषाम्—प्रथानुसार; पूर्व-जै:—पूर्ववर्ती दार्शनिक द्वारा सुझाया ज्ञान; कृतम्—किया हुआ ।.
 
अनुवाद
 
 हे महर्षि, आप आदि प्राणी ब्रह्मा के तुल्य हैं। अन्य लोग केवल प्रथा का पालन करते हैं जिस प्रकार पूर्ववर्ती दार्शनिक चिन्तक किया करते हैं।
 
तात्पर्य
 यहाँ यह दलील रखी जा सकती है कि शुकदेव गोस्वामी ही अध्यात्म सम्बन्धी पूर्णज्ञान के एकमात्र अधिकारी नहीं—अनेक अन्य मुनि तथा उनके अनुयायी भी अधिकारी हैं। व्यासदेव के समकालीन अथवा उनसे भी पूर्व अनेक महर्षि हुए हैं यथा गौतम, कणाद, जैमिनि, कपिल तथा अष्टावक्र और इन सभी ने अपने-अपने दार्शनिक मार्ग प्रस्तुत किये हैं। पतञ्जलि भी इनमें से एक हैं। इस प्रकार इन छहों ऋषियों की, आधुनिक दार्शनिकों तथा चिन्तकों के ही समान, अपनी-अपनी विचारधाराएँ हैं। श्रीशुकदेव गोस्वामी तथा उपर्युक्त छहों ऋषियों के दार्शनिक मार्गों में यही अन्तर है कि जहाँ छहों ऋषि अपने चिन्तन के अनुसार तथ्यों का वर्णन करते हैं, वहीं श्रीमद्भागवत में शुकदेव गोस्वामी प्रत्यक्ष ब्रह्मा से प्राप्त ज्ञान को प्रस्तुत करते हैं, जिन्हें आत्मभू: कहा जाता है अर्थात् वे जो सर्वशक्तिमान भगवान् से जन्मे हों और उन्हीं से शिक्षित किए हुए हों।

वैदिक दिव्य ज्ञान का अवतरण सीधे भगवान् से होता है। भगवत्कृपा से ब्रह्माण्ड के प्रथम जीव ब्रह्माजी को ज्ञान प्राप्त हुआ; ब्रह्मा से नारद को और नारद से व्यास को ज्ञान मिला। शुकदेव गोस्वामी ने इस दिव्य ज्ञान को सीधे अपने पिता व्यासदेव से प्राप्त किया। इस प्रकार शिष्य-परम्परा से प्राप्त ज्ञान परिपूर्ण है। जब तक कोई शिष्य-परम्परा से ज्ञान प्राप्त नहीं करता तब तक वह पूर्ण रूप से गुरु नहीं बन सकता। दिव्य ज्ञान प्राप्त करने का यही रहस्य है। भले ही उपर्युक्त छहों ऋषि महान् चिन्तक हों, किन्तु चिन्तन द्वारा प्राप्त उनका ज्ञान पूर्ण नहीं है। दार्शनिक मत प्रस्तुत करने में कोई ज्ञानमार्गी चाहे कितना ही पूर्ण क्यों न हो ऐसा ज्ञान कभी भी पूर्ण नहीं होता, क्योंकि वह अपूर्ण मस्तिष्क (मन) की उपज होता है। ऐसे ऋषियों की भी शिष्य-परम्पराएँ होती हैं, किन्तु ये प्रामाणिक नहीं होतीं, क्योंकि वे स्वतन्त्र, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् नारायण से प्राप्त नहीं हैं। नारायण के अतिरिक्त कोई भी स्वतन्त्र नहीं हो सकता, अत: किसी का भी ज्ञान पूर्ण नहीं है, क्योंकि हर एक का ज्ञान चलायमान मन (मस्तिष्क) पर आश्रित है। मन पदार्थ है, अत: भौतिक चिन्तकों द्वारा प्रस्तुत ज्ञान कभी भी दिव्य और पूर्ण नहीं हो सकता। संसारी दार्शनिक स्वयं अपूर्ण होने के कारण अन्य दार्शनिकों से मतभेद रखता है और संसारी दार्शनिक का कोई अपना सिद्धान्त न होने से वह दार्शनिक कभी नहीं कहा जा सकता। महाराज परीक्षित जैसे बुद्धिमान पुरुष इन चिन्तकों को नहीं मानते, चाहे वे कितने ही बड़े क्यों न हों। वे तो केवल शुकदेव गोस्वामी जैसे अधिकारी से सुनते हैं, जो परम्परा-पद्धति के द्वारा श्रीभगवान् से अभिन्न होते हैं जैसाकि भगवद्गीता में विशेष बल के साथ कहा गया है।

 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥