श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 8: राजा परीक्षित द्वारा पूछे गये प्रश्न  »  श्लोक 28

 
श्लोक
प्राह भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।
ब्रह्मणे भगवत्प्रोक्तं ब्रह्मकल्प उपागते ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
प्राह—कहा; भागवतम्—तत्त्वज्ञान; नाम—नामक; पुराणम्—उपवेद; ब्रह्म-सम्मितम्—वेदों के अनुकरण में; ब्रह्मणे—ब्रह्माजी से; भगवत्-प्रोक्तम्—भगवान् द्वारा कही गई; ब्रह्म-कल्पे—उस युग में जिसमें सर्वप्रथम ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई; उपागते—प्रारम्भ में ही ।.
 
अनुवाद
 
 उन्होंने महाराज परीक्षित के प्रश्नों का उत्तर देना यह कहकर प्रारम्भ किया कि इस तत्त्व ज्ञान को सर्वप्रथम स्वयं भगवान् ने ब्रह्मा से उनके जन्म के समय कहा। श्रीमद्भागवत उपवेद है और वेदों का ही अनुकरण करता है।
 
तात्पर्य
 श्रीमद्भागवत तत्त्व-ज्ञान (भगवान् का विज्ञान) है। इस महान् ज्ञान को न जानने के कारण निर्विशेषवादी सदैव भगवान् के सगुण रूप को ठीक से प्रस्तुत नहीं करते। श्रीमद्भागवत वेदों तथा तत्त्व-ज्ञान का ही अनुकरण है। इस ज्ञान को सीखने के लिए मनुष्य को चाहिए कि वह श्रील शुकदेव के प्रतिनिधि की शरण में जाय और महाराज परीक्षित
के पदचिह्नों का अनुसरण करे। वह अज्ञानतावश इसकी व्याख्या का प्रयास करके भगवान् के चरणों के प्रति अपराध न करे। अभक्तों द्वारा हानिकारक ढंग से श्रीमद्भागवत की व्याख्या किये जाने से इसको समझने में काफी अराजकता उत्पन्न हुई है। जिज्ञासु को चाहिए कि यदि वह तत्त्व-ज्ञान जानने का इच्छुक हो तो वह इस ढंग से सतर्क रहे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥