श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 8: राजा परीक्षित द्वारा पूछे गये प्रश्न  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
कथयस्व महाभाग यथाहमखिलात्मनि ।
कृष्णे निवेश्य नि:सङ्गं मनस्त्यक्ष्ये कलेवरम् ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
कथयस्व—कृपया आगे कहें; महाभाग—हे परमभाग्यशाली; यथा—जिस प्रकार; अहम्—मैं; अखिल-आत्मनि—परमात्मा को; कृष्णे—भगवान् श्रीकृष्ण को; निवेश्य—स्थापित करके; नि:सङ्गम्—भौतिक गुणों से मुक्त होकर; मन:—मन; त्यक्ष्ये— परित्याग कर सकूँ; कलेवरम्—शरीर ।.
 
अनुवाद
 
 हे परम भाग्यशाली शुकदेव गोस्वामी, आप मुझे कृपा करके श्रीमद्भागवत सुनाते रहें जिससे मैं अपना मन परमात्मा, भगवान् श्रीकृष्ण में स्थिर कर सकूँ और इस प्रकार भौतिक गुणों से सर्वथा मुक्त होकर अपना यह शरीर त्याग सकूँ।
 
तात्पर्य
 श्रीमद्भागवत में वर्णित कथा में पूर्ण रूप से तन्मय होने का अर्थ है परमात्मा श्रीकृष्ण के साथ निरन्तर साहचर्य और ऐसे साहचर्य का अर्थ होता है भौतिक गुणों से मुक्त हो जाना। भगवान् श्रीकृष्ण सूर्य के समान हैं और भौतिक कल्मष अन्धकार के तुल्य है। जिस प्रकार सूर्य की उपस्थिति में अंधकार हट जाता है, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण का निरन्तर साहचर्य भौतिक गुणों के कल्मष को दूर करने वाला है। भौतिक गुणों का कल्मष बारबार जन्म तथा मृत्यु का कारण है और भौतिक गुणों से मुक्ति गुणातीत (सत्व) होना है। मुक्ति के इस रहस्य को जान लेने के कारण महाराज परीक्षित को अब आत्म-साक्षात्कार हो चुका था क्योंकि श्रील शुकदेव गोस्वामी ने राजा को बता दिया था कि परम सिद्धि तो मृत्यु के समय नारायण के स्मरण में निहित है। महाराज परीक्षित को सात दिनों के पश्चात् शरीर त्याग करना था, अत: उन्होंने श्रीमद्भागवत की कथा के माध्यम से भगवान् का स्मरण करते रहने और इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण के समक्ष पूर्णत: सचेष्ट रहकर शरीर त्यागने का निश्चय किया।

जो लोग वृत्तिक रूप में श्रीमद्भागवत सुनते हैं उनका सुनना महाराज परीक्षित के दिव्य श्रवण करने से भिन्न होता है। महाराज परीक्षित को परम सत्य रूप भगवान् श्रीकृष्ण का साक्षात्कार हो चुका था। सकाम भौतिकतावादी मुक्त-आत्मा नहीं होता; वह श्रीमद्भागवत को सुनकर कोई भौतिक लाभ उठाना चाहता है। निस्सन्देह ऐसे श्रोता, वृत्तिकवाचक से श्रीमद्भागवत सुनकर कुछ यथेष्ठ भौतिक लाभ उठा सकते हैं किन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि एक सप्ताह तक श्रीमद्भागवत का कृत्रिम श्रवण करना महाराज परीक्षित द्वारा श्रवण करने के समान लाभदायक है।

विचारवान् व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह आत्म-साक्षात्कार प्राप्त व्यक्ति से श्रीमद्भागवत सुने और वृत्तिक लोगों के द्वारा ठगा न जाय। मनुष्य को चाहिए कि वह जीवन के अन्तिम समय तक इसी प्रकार श्रीमद्भागवत सुनता रहे जिससे वास्तव में भगवान् की दिव्य संगति प्राप्त हो सके और इस प्रकार मुक्त हो सके।

यद्यपि महाराज परीक्षित ने अपना राज्य तथा परिवार, जो भौतिकतावाद के सर्वाकर्षक अंग हैं, पहले ही त्याग दिये थे किन्तु तो भी वे अपने भौतिक शरीर के प्रति सचेत थे। वे भगवान् की निरन्तर संगति द्वारा ऐसे बन्धन से भी मुक्त होना चाह रहे थे।

 
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