श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 8: राजा परीक्षित द्वारा पूछे गये प्रश्न  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक
धौतात्मा पुरुष: कृष्णपादमूलं न मुञ्चति ।
मुक्त सर्वपरिक्लेश: पान्थ: स्वशरणं यथा ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
धौत-आत्मा—जिनके हृदय विमल हो चुके हैं; पुरुष:—जीव; कृष्ण—श्रीभगवान् के; पाद-मूलम्—चरणकमल की शरण; न—नहीं; मुञ्चति—छोड़ता है; मुक्त—मुक्त; सर्व—समस्त; परिक्लेश:—जीवन के समस्त क्लेशों का; पान्थ:—पथिक; स्व शरणम्—अपने धाम में; यथा—जिस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् का शुद्ध भक्त, जिस का हृदय एक बार भक्ति के द्वारा स्वच्छ हो चुका होता है, वह श्रीकृष्ण के चरणकमलों का कभी भी परित्याग नहीं करता, क्योंकि उसे भगवान् वैसी ही परम तुष्टि देते हैं, जैसी कि कष्टकारी यात्रा के पश्चात् पथिक को अपने घर में प्राप्त होती है।
 
तात्पर्य
 जो परमेश्वर श्रीकृष्ण का शुद्ध भक्त नहीं है उसका हृदय पूर्णत: स्वच्छ नहीं होता, किन्तु पूर्णत: शुद्ध हृदय वाला व्यक्ति भगवान् की भक्ति कभी नहीं छोड़ता। ब्रह्माजी ने नारद को श्रीमद्भागवत का उपदेश देते समय जैसा आदेश दिया था, उस प्रकार की भक्ति का पालन करने में कभी-कभी उपदेश कार्य में लगे हुए भगवान् के प्रतिनिधि को अनेक तथाकथित कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। जगाई तथा माधाई नामक दो पतितों का उद्धार करते समय श्रीनित्यानन्द के साथ ऐसा ही हुआ। इसी प्रकार अविश्वासियों द्वारा जीससक्राइस्ट को क्रूस पर चढ़ा दिया गया। किन्तु उपदेशक भक्त ऐसे कष्टों को, जो ऊपर से बहुत घोर दिखते हैं, सहर्ष सहन कर लेते हैं, क्योंकि ऐसे कार्यों से भगवान् प्रसन्न हो जाते हैं जिससे भक्तों को दिव्य आनन्द प्राप्त होता है। यद्यपि प्रह्लाद महाराज को घोर यातनाएँ सहनी पड़ीं, तो भी उन्होंने भगवान् के चरणकमलों को विस्मृत नहीं किया। इसका एकमात्र कारण यह है कि शुद्ध भक्त का हृदय इतना पवित्र होता है कि वह किसी भी स्थिति में भगवान् कृष्ण की शरण का परित्याग नहीं कर सकता। ऐसी सेवा में कोई स्वार्थ निहित नहीं रहता। ज्ञानियों को ज्ञान का अनुशीलन अथवा योगियों को शारीरिक आसन का अन्तत: परित्याग करना होता है, किन्तु भक्त भगवान् की भक्ति नहीं छोड़ सकता, क्योंकि उसे गुरु से इसका आदेश प्राप्त हुआ होता है। नारद तथा नित्यानन्द प्रभु जैसे शुद्ध भक्त गुरु की आज्ञा को प्राणाधार मानते हैं। वे अपने भविष्य की तनिक भी परवाह नहीं करते। वे इस मामले को बहुत गंभीरता से लेते हैं क्योंकि यह आदेश भगवान् के प्रतिनिधि से या स्वयं भगवान् से प्राप्त हुआ होता है।

यहाँ पर दिया गया उदाहरण अत्यन्त उपयुक्त है। पथिक (यात्री) धन कमाने के लिए घर छोड़ कर दूर-दूर के देशों को जाता है, कभी वह वन से होकर जाता है, तो कभी समुद्र से होकर या कभी कभी पर्वतों की चोटियों से होकर जाता है। निस्सन्देह ऐसे अपरिचित स्थानों में जाने पर पथिक को अनेक कष्ट मिलते हैं। किन्तु ये सारे कष्ट उस क्षण कम हो जाते हैं जब वह अपने परिवार का स्मरण करता है और फिर जब वह घर लौट आता है, तो मार्ग के सारे कष्टों को भूल जाता है।

भगवान् का शुद्ध भक्त भगवान् के साथ पारिवारिक रूप में बँधा होता है, अत: वह अपने कर्तव्य को बिना रुके प्रेमपूर्वक निभाता रहता है।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥