श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 9: श्रीभगवान् के वचन का उद्धरण देते हुए प्रश्नों के उत्तर  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक
श्यामावदाता: शतपत्रलोचना:
पिशङ्गवस्त्रा: सुरुच: सुपेशस: ।
सर्वे चतुर्बाहव उन्मिषन्मणि-
प्रवेकनिष्काभरणा: सुवर्चस: ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
श्याम—नीलवर्ण; अवदाता:—आभा से युक्त; शत-पत्र—कमल-पुष्प; लोचना:—आँखें; पिशङ्ग—पीले रंग का; वस्त्रा:— वस्त्र; सु-रुच:—अत्यन्त आकर्षक; सु-पेशस:—तरुण; सर्वे—सभी; चतु:—चार; बाहव:—बाहें, हाथ; उन्मिषन्— कान्तिमान्; मणि—मोती; प्रवेक—उत्त कोटि के; निष्क-आभरणा:—आलंकारिक आभूषण; सु-वर्चस:—तेजमय ।.
 
अनुवाद
 
 वैकुण्ठ लोक के वासियों को आभामय श्यामवर्ण का बताया गया है। उनकी आँखें कमल-पुष्प के समान, उनके वस्त्र पीलाभ रंग के और उनकी शारीरिक संरचना अत्यन्त आकर्षक है। वे उभरते हुए तरुणों की तरह हैं, उन सबके चार-चार हाथ हैं। वे मोती के हारों तथा अलंकृत पदकों से भली-भाँति विभूषित होकर अत्यन्त तेजवान् प्रतीत होते हैं।
 
तात्पर्य
 वैकुण्ठ लोक के वासी दिव्य अंग प्रत्यंगों वाले ऐसे महापुरुष हैं, जो इस लोक में नहीं पाये जाते। इनका वर्णन हमें श्रीमद्भागवत जैसे ग्रन्थों में ही मिलता है। इन ग्रन्थों में दिव्यता के जो निर्विशेष वर्णन प्राप्त होते हैं, वे यह इंगित करते हैं कि वैकुण्ठ लोक की सी शारीरिक रचना ब्रह्माण्ड में अन्यत्र कहीं नहीं देखी जाती है। जिस प्रकार किसी एक लोक के विभिन्न स्थानों में शारीरिक रचना पृथक्-पृथक् होती है या विभिन्न लोकों के प्राणियों के शरीरों की पृथक्-पृथक् रचना होती है, उसी प्रकार वैकुण्ठ लोक के वासियों की शारीरिक रचना भी भौतिक जगत के वासियों से सर्वथा भिन्न है। उदाहरणार्थ, वहाँ के चार हाथ इस संसार के दो हाथ से भिन्न हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥