श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 9: श्रीभगवान् के वचन का उद्धरण देते हुए प्रश्नों के उत्तर  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक
भृत्यप्रसादाभिमुखं द‍ृगासवं
प्रसन्नहासारुणलोचनाननम् ।
किरीटिनं कुण्डलिनं चतुर्भुजं
पीतांशुकं वक्षसि लक्षितं श्रिया ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
भृत्य—दास; प्रसाद—स्नेह; अभिमुखम् दृक्—दृष्टि; आसवम्—मादक पदार्थ; प्रसन्न—अत्यन्त प्रसन्न; हास—हँसी; अरुण— लाल; लोचन—नेत्र; आननम्—मुख; किरीटिनम्—मुकुटयुक्त; कुण्डलिनम्—कुण्डलों सहित; चतु:-भुजम्—चारों हाथों से युक्त; पीत—पीला; अंशुकम्—वस्त्र; वक्षसि—छाती पर; लक्षितम्—अंकित; श्रिया—लक्ष्मी से ।.
 
अनुवाद
 
 अपने प्रिय दासों की ओर कृपा दृष्टि डालते हुए, मादक तथा आकर्षक दृष्टि वाले भगवान् अत्यधिक तुष्ट लगे। उनका मुस्काता मुख मोहक लाल रंग से सुशोभित था। वे पीले वस्त्र पहने थे और कानों में कुण्डल तथा सिर में मुकुट धारण किये हुए थे। उनके चार हाथ थे और उनका वक्षस्थल लक्ष्मीजी की रेखाकृतियों से चिह्नित था।
 
तात्पर्य
 पद्म पुराण के उत्तर खंड में योगपीठ का अर्थात् उस स्थान का जहाँ भगवान् अपने नित्य भक्तों को दर्शन देते हैं, पूर्ण विवरण दिया हुआ है। उस योगपीठ में साक्षात् धर्म, ज्ञान, ऐश्वर्य तथा त्याग भगवान् के चरणकमलों पर आसीन हैं। वहाँ पर ऋक्, साम, यजु: तथा अथर्व—ये चारों वेद भगवान् को सलाह देने के लिए उपस्थित हैं। चण्ड आदि सोलहों शक्तियाँ वहाँ विद्यमान हैं। चण्ड तथा कुमुद प्रथम दो द्वारपाल हैं; बीच के द्वार पर भद्र तथा सुभद्र और अन्तिम द्वार पर जय तथा विजय हैं। कुमुद, कुमुदाक्ष, पुण्डरीक, वामन, शंकुकर्ण, सर्वनेत्र, सुमुख आदि अन्य द्वारपाल भी हैं। भगवान् का महल अच्छी तरह सजा हुआ तथा उपर्युक्त द्वारपालों द्वारा रक्षित है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥