श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 9: श्रीभगवान् के वचन का उद्धरण देते हुए प्रश्नों के उत्तर  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक
सृजामि तपसैवेदं ग्रसामि तपसा पुन: ।
बिभर्मि तपसा विश्वं वीर्यं मे दुश्चरं तप: ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
सृजामि—उत्पन्न करता हूँ; तपसा—तपस्या की उसी शक्ति से; एव—निश्चय ही; इदम्—यह; ग्रसामि तपसा—उसी शक्ति से अपने में लीन करता हूँ; पुन:—फिर; बिभर्मि—पालन करता हूँ; तपसा—तप से; विश्वम्—विश्व; वीर्यम्—शक्ति; मे—मेरा; दुश्चरम्—कठिन; तप:—तपस्या ।.
 
अनुवाद
 
 मैं ऐसे ही तप से इस विश्व की रचना करता हूँ, इसी शक्ति से इसका पालन करता हूँ और इसीसे इसको अपने में लीन करता हूँ। अत: तप ही वास्तविक शक्ति है।
 
तात्पर्य
 तपस्या करते समय मनुष्य को भगवान् के धाम लौट जाने का संकल्प करना चाहिए और इसके लिए सभी प्रकार के कष्ट सहने के लिए तैयार रहना चाहिए। भौतिक सम्पत्ति, नाम तथा यश के लिए भी तो कठिन तपस्या करनी पड़ती है, क्योंकि उसके बिना कोई भी भौतिक संसार में प्रसिद्ध नहीं हो सकता। तो फिर, भक्ति की सिद्धि के लिए ही कठिन तपस्या क्यों करनी होती है? सुविधासम्पन्न जीवन तथा दिव्य साक्षात्कार के लिए सिद्धि की प्राप्ति दोनों साथ-साथ सम्भव नहीं हैं। भगवान् जीवात्मा से अधिक चतुर हैं, अत: वे देखना चाहते हैं कि भक्ति-मय सेवा के लिए भक्त कितना कष्ट उठाता है। तपस्या का आदेश भगवान् से सीधे या प्रामाणिक गुरु के माध्यम से प्राप्त होता है और यह आदेश आपको चाहे कितना ही कष्ट-प्रद क्यों न हो इसका पालन करना ही कठिन तपस्या है। जो इस नियम का दृढ़ता से पालन करता है उसे निश्चित रूप से भगवान् की कृपा प्राप्त करने में सफलता प्राप्त होती है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥