श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 9: श्रीभगवान् के वचन का उद्धरण देते हुए प्रश्नों के उत्तर  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक
ब्रह्मोवाच
भगवन् सर्वभूतानामध्यक्षोऽवस्थितो गुहाम् ।
वेद ह्यप्रतिरुद्धेन प्रज्ञानेन चिकीर्षितम् ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
ब्रह्मा उवाच—ब्रह्माजी ने कहा; भगवन्—हे भगवान्; सर्व भूतानाम्—समस्त जीवात्माओं का; अध्यक्ष:—नियन्ता; अवस्थित:—स्थित; गुहाम्—हृदय के भीतर; वेद—जानो; हि—निश्चय ही; अप्रतिरुद्धेन—बिना बाधा के; प्रज्ञानेन—अन्त:ज्ञान द्वारा; चिकीर्षितम्—प्रयास करता है ।.
 
अनुवाद
 
 ब्रह्माजी ने कहा, हे भगवान्, आप प्रत्येक जीवात्मा के हृदय में परम नियन्ता के रूप में स्थित हैं, अत: आप किसी भी प्रकार की बाधा के बिना अपने अन्त:-ज्ञान (प्रज्ञा) द्वारा समस्त प्रयासों से अवगत हैं।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता पुष्टि करती है कि भगवान् साक्षी रूप से प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में स्थित हैं, फलस्वरूप वे परम नियन्ता हैं। नियन्ता कर्मफलों का भोक्ता नहीं है, क्योंकि उनकी स्वीकृति के बिना कोई सुख नहीं भोग सकता। उदाहरणार्थ, निषिद्ध क्षेत्र का अभ्यस्त शराबी शराब के निदेशक को आवेदन पत्र भेजता है और निदेशक आवेदन पत्र पर विचार करके शराब की कुछ मात्रा की स्वीकृति देता है। इसी प्रकार यह संसार मानो ऐसे ही शराबियों से भरा पड़ा है प्रत्येक जीवात्मा कुछ-न-कुछ चाहता है और प्रत्येक जीवात्मा उसकी पूर्ति के लिए व्यग्र रहता है। जिस प्रकार पिता पुत्र पर दयालु होता है उसी प्रकार परमेश्वर प्रत्येक जीवात्मा पर सदय होने के कारण उसकी बचकानी इच्छाओं की पूर्ति करता रहता है। मन में ऐसी इच्छाओं को लेकर जीवात्मा वास्तव में कभी भी उन्हें भोग नहीं पाता, बल्कि बिना किसी लाभ के व्यर्थ की शारीरिक सनकों को पूरा करता है। शराबी को शराब पीने से कोई लाभ नहीं मिलता, किन्तु लत पडऩे के कारण वह उसका दास बनकर उससे छुटकारा नहीं चाहता, अत: दयालु भगवान् उसकी इच्छाओं की पूर्ति के लिए उसे सारी सुविधाएँ प्रदान कर देते हैं।

निर्विशेषवादी चाहते हैं कि मनुष्य इच्छारहित हो और अन्य लोग इच्छाओं का पूर्ण दमन चाहते हैं। यह असम्भव है इच्छाओं का लोप नहीं हो सकता, क्योंकि इच्छा करना जीवन का लक्षण है। इच्छाओं के बिना जीवात्मा मृत हो जाएगा, जो वह नहीं है। अत: जीवन तथा इच्छाएँ साथ-साथ हैं। यदि मनुष्य ईश्वर की सेवा करने की इच्छा करता है, तो इच्छाओं की पूर्ति हो जाती है और ईश्वर भी चाहते हैं कि जीवात्मा अपनी निजी इच्छाएँ त्यागकर उनकी इच्छाओं के साथ सहयोग करे। यही भगवद्गीता का अन्तिम उपदेश है। ब्रह्माजी ने इस प्रस्ताव को माना और इसलिए शून्य ब्रह्माण्ड में सृष्टि करने का उन्हें उत्तरदायित्व सौंपा गया। अत: ईश्वर के साथ तादात्म्य का अर्थ है भगवान् की इच्छाओं के साथ अपनी इच्छाओं को जोडऩा। इसीसे समस्त कामनाओं की सिद्धि होती है।

प्रत्येक जीवात्मा के हृदय में स्थित होने के कारण भगवान् को हर एक के मन की बात ज्ञात रहती है और कोई भी व्यक्ति अन्त:स्थित भगवान् की जानकारी के बिना कुछ भी नहीं कर सकता। अपनी श्रेष्ठ प्रज्ञा द्वारा भगवान् सबको अपनी इच्छा-पूर्ति का पूर्णरूपेण अवसर प्रदान करते हैं और तदनुरुप फल भी भगवान द्वारा ही दिया जाता है।

 
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