श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 9: श्रीभगवान् के वचन का उद्धरण देते हुए प्रश्नों के उत्तर  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक
क्रीडस्यमोघसङ्कल्प ऊर्णनाभिर्यथोर्णुते ।
तथा तद्विषयां धेहि मनीषां मयि माधव ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
क्रीडसि—जिस प्रकार खिलवाड़ करते हो; अमोघ—अचूक; सङ्कल्प—निश्चय; ऊर्णनाभि:—मकड़ी; यथा—जिस प्रकार; ऊर्णुते—ढक लेती है; तथा—उसी प्रकार; तत्-विषयाम्—उनके विषय में; धेहि—मुझे बताएँ; मनीषाम्—दार्शनिक विधि से; मयि—मुझको; माधव—समस्त शक्तियों के स्वामी ।.
 
अनुवाद
 
 हे माधव, मुझे उन सबके विषय में दार्शनिक विधि से बताएँ। आप मकड़ी के समान खेल करने वाले हैं, जो अपनी ही शक्ति से अपने को ढक लेती है। आपका संकल्प अचूक है।
 
तात्पर्य
 भगवान् की अकल्पनीय शक्ति से प्रत्येक तत्त्व में उसकी निजी शक्तियाँ होती हैं, जिन्हें तत्त्व-शक्ति, ज्ञान-शक्ति तथा कार्य-कारण की शक्ति कहते हैं। भगवान् की ऐसी शक्तियों के संयोग से यथासमय सृष्टि, पालन तथा संहार का प्राकट्य होता है जिनके विभिन्न कर्ता ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर हैं। ब्रह्मा सृष्टिकर्ता हैं, विष्णु पालनकर्ता हैं और शिव संहारकर्ता हैं। किन्तु ये सभी कर्ता तथा शक्तियाँ भगवान् के ही प्रतिकप हैं, अत: भगवान् के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है, अथवा विभिन्न विविधताओं का एक ही परम स्रोत है। इसका सही उदाहरण मकड़ी तथा मकड़ी का जाला है। यह जाला मकड़ी द्वारा बुना जाता है, उसी के द्वारा उसकी रक्षा की जाती है और जब मकड़ी की इच्छा होती है, तो वह उसे अपने भीतर समेट लेती है। मकड़ी जाले के भीतर ढकी रहती है। यदि एक तुच्छ मकड़ी अपनी इच्छानुसार कार्य करने की इतनी शक्ति रखती है, तो फिर परमात्मा अपनी परम इच्छा से सांसारिक प्राकट्य के सृजन, पालन तथा संहार का कार्य क्यों नहीं कर सकते? भगवत्कृपा से ही ब्रह्मा जैसा कोई भक्त या उन्हीं के समान शिष्य-परम्परा में से कोई अन्य भक्त सर्वशक्ति-मान भगवान् को समझ सकता है, जो विभिन्न शक्तियों के द्वारा अपनी दिव्य लीलाओं में नित्य लगे रहते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥