श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 9: श्रीभगवान् के वचन का उद्धरण देते हुए प्रश्नों के उत्तर  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक
भगवच्छिक्षितमहं करवाणि ह्यतन्द्रित: ।
नेहमान: प्रजासर्गं बध्येयं यदनुग्रहात् ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
भगवत्—भगवान् द्वारा; शिक्षितम्—शिक्षा प्राप्त; अहम्—मैं; करवाणि—कार्य के द्वारा; हि—निश्चय ही; अतन्द्रित:— कारणस्वरूप; न—कभी नहीं; इहमान:—यद्यपि कार्य करते हुए; प्रजा-सर्गम्—जीवात्माओं की उत्पत्ति; बध्येयम्—बद्ध होऊँ; यत्—जिससे; अनुग्रहात्—कृपा से ।.
 
अनुवाद
 
 कृपा करके मुझे बतलाएँ जिससे आपकी आज्ञानुसार मैं इस विषय की शिक्षा प्राप्त कर सकूँ और इस तरह ऐसे कार्यों से आबद्ध हुए बिना जीवात्माओं को यंत्रवत् उत्पन्न करने का कार्य करता रहूँ।
 
तात्पर्य
 ब्रह्माजी नहीं चाहते कि वे अपने निजी ज्ञान पर आश्रित रहने वाले शुष्क चिन्तक बने रहें और भौतिक बन्धन में फँसे रहें। हर एक व्यक्ति को यह समझ लेना चाहिए कि समस्त कार्यों के सम्पादन में वह निमित्त (कारण) मात्र होता है। बद्धजीव बाह्यशक्ति अर्थात् गुणमयी माया के हाथों की कठपुतली बना रहता है और मुक्त होते समय वह सीधे भगवान् की इच्छा पर आश्रित रहता है। भगवान् की प्रत्यक्ष इच्छा पर आश्रित रहना जीवात्मा की स्वाभाविक स्थिति है, जबकि गुणमयी माया के हाथों की कठपुतली होना भवबन्धन है। उस बद्ध अवस्था में जीवात्मा परम सत्य भगवान् तथा उनके विविध कार्यकलापों का चिन्तन करता है, किन्तु अबद्ध (मुक्त) अवस्था में जीवात्मा को सीधे भगवान् से ज्ञान प्राप्त होता है और ऐसा मुक्त जीव बिना कल्पना किये, बिना त्रुटि के, कार्य करता है। भगवद्गीता (१०.१०-११) में इसकी दृढ़तापूर्वक पुष्टि की गई है कि भगवान् स्वयं उपदेश देते हैं जिससे शुद्ध भक्तगण, जो भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में रत हैं, बिना डगमगाये भगवान् के धाम की ओर अग्रसर होते रहते हैं। अत: शुद्ध भक्तों को अपनी निश्चित प्रगति पर किसी प्रकार का गर्व नहीं रहता, जबकि अभक्त ज्ञानी सदा ही माया के अन्धकार में रहता है और बिना किसी निश्चित पथ के कल्पना पर आधारित पथभ्रष्ट ज्ञान पर इतराता रहता है। ब्रह्माजी अंहकार के उस गर्त से बचना चाहते थे, यद्यपि वे ब्रह्माण्ड में सबसे उच्च पद पर आरूढ़ थे।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥