श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 9: श्रीभगवान् के वचन का उद्धरण देते हुए प्रश्नों के उत्तर  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक
यावत् सखा सख्युरिवेश ते कृत:
प्रजाविसर्गे विभजामि भो जनम् ।
अविक्लवस्ते परिकर्मणि स्थितो
मा मे समुन्नद्धमदोऽजमानिन: ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
यावत्—चूँकि; सखा—मित्र; सख्यु:—मित्र को; इव—समान; ईश—हे भगवान्; ते—तुम; कृत:—स्वीकार किया है; प्रजा— जीवात्माएँ; विसर्गे—सृष्टि के कार्य में; विभजामि—क्योंकि मैं इसे भिन्न रीति से करूँगा; भो:—हे भगवान्; जनम्—जन्म लेने वाले; अविक्लव:—विचलित हुए बिना; ते—तुम्हारा; परिकर्मणि—सेवा कार्य में; स्थित:—स्थित; मा—कभी न हो; मे— मुझको; समुन्नद्ध—उदय होने पर; मद:—उन्माद; अज—हे अजन्मा; मानिन:—ऐसे माने जाने वाले ।.
 
अनुवाद
 
 हे अजन्मा भगवान्, आपने मुझसे उसी प्रकार हाथ मिलाया है, जिस प्रकार कोई मित्र अपने मित्र से मिलाता है (मानो पद में समान हो)। अब मैं विभिन्न जीवात्माओं की सृष्टि करने में लगूँगा और आपकी सेवा करता रहूँगा। मैं किसी तरह विचलित नहीं होऊँगा। किन्तु मेरी प्रार्थना है कि कहीं इन सबसे मुझे गर्व न हो जाय कि मैं ही परमेश्वर हूँ।
 
तात्पर्य
 ब्रह्माजी भगवान् के साथ निश्चय ही सख्यभाव में स्थित हैं। प्रत्येक जीव भगवान् के साथ पाँच विभिन्न दिव्य भावों में से किसी न किसी एक के द्वारा नित्य रूप से सम्बद्ध है। ये हैं—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य तथा माधुर्य। हम भगवान् के प्रसंग में इन पाँचों भावों की व्याख्या पहले ही कर चुके हैं। यहाँ पर यह स्पष्ट है कि ब्रह्माजी भगवान् के साथ दिव्य सख्यभाव में स्थित थे। शुद्ध भक्त भगवान् से इन पाँचों में से किसी एक भाव से बँधा हो सकता है। वह वात्सल्य भाव भी हो सकता है, किन्तु भगवद्भक्त सदैव भगवान् का दिव्य दास (सेवक) होता है। कोई न तो उनके समान है, न उनसे बढक़र। यही भगवद्गीता की उक्ति है। यद्यपि भगवान् के साथ ब्रह्माजी का सख्यभाव है और उन पर विभिन्न योनि वाले जीवों को उत्पन्न करने का सर्वोच्च पद भार सौंपा गया है, किन्तु उन्हें अपनी स्थिति का बोध निरन्तर बना रहता है कि वे न तो परमेश्वर हैं न परम शक्तिसम्पन्न। सम्भव है कि इस ब्रह्माण्ड में या इसके बाहर कोई अत्यन्त शक्तिशाली व्यक्ति भगवान् से भी अधिक शक्तिशाली निकल आए। फिर भी शुद्ध भक्त जानता है कि यह शक्ति तो भगवान् द्वारा प्रदत्त विभूति है और ऐसी शक्ति से युक्त जीवात्मा कभी स्वतन्त्र नहीं हो सकता। श्रीहनुमानजी ने कूद कर समुद्र पार कर लिया था, किन्तु श्रीरामचन्द्र ने सेतु पर चढक़र ही पार किया जिसका अर्थ यह नहीं है कि हनुमानजी उनसे अधिक बलशाली थे। कभी-कभी भगवान् भक्त को असामान्य शक्ति प्रदान करते हैं, किन्तु भक्त हमेशा जानता रहता है कि यह शक्ति भगवान् की ही है और वह स्वयं एक निमित्त मात्र है। भक्त कभी भी उन अभक्तों के समान फूला फूला नहीं फिरता जो भ्रमवश अपने को भगवान् मान लेते हैं। यह आश्चर्यजनक बात है कि जो व्यक्ति भगवान् की माया के नियमों के द्वारा पग-पग पर पाद-प्रहार पाता है, वह भगवान् से तदाकार होने की झूठी बात सोचे। इस प्रकार सोचना बद्धजीवों के ऊपर फेंका गया माया का आखिरी पाश होता है। पहली भ्रांति यह होती है कि वह सम्पत्ति एवं शक्ति बटोरकर संसार का स्वामी बनना चाहता है, किन्तु जब वह इस प्रयास में हताश हो जाता है, तो भगवान् के साथ तदाकार होना चाहता है। इस प्रकार संसार का सबसे अधिक शक्तिशाली व्यक्ति बनना और भगवान् से तादात्म्य करना माया के ही भिन्न-भिन्न जाल हैं। चूँकि भगवान् के शुद्ध भक्त शरणागत होते हैं, अत: वे माया के मोह पाश से ऊपर हैं। किन्तु ब्रह्माजी शुद्ध भक्त होने के कारण अल्पज्ञानी अभक्तों को भगवान् से तादात्म्य की बात के बारे में सोचना कभी पसन्द नहीं करते यद्यपि वे विश्व के आदि देव हैं और अनेक अद्भुत कार्य करने में सक्षम हैं। अल्पज्ञानियों को, जब वे ईश्वर होने के झूठे विचार से फूल उठते हैं, ब्रह्माजी से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए।

वस्तुत: ब्रह्माजी जीवात्माओं को उत्पन्न नहीं करते। उन्हें सृष्टि के प्रारम्भ में यह अधिकार दिया गया कि वे जीवात्माओं को पूर्व कल्प में किये गये कर्मों के अनुसार शरीर प्रदान करें। ब्रह्माजी का कार्य इन जीवात्माओं को निद्रा से जगाकर उन्हें उनके समुचित कार्यों में लगाना है। ब्रह्माजी जीवात्माओं की सृष्टि मनमाने ढंग से नहीं करते, अपितु उन्हें विविध प्रकार के शरीर प्रदान करने का कार्यभार सौंपा जाता है, जिससे वे तदनुसार कर्म कर सकें। इतने पर भी ब्रह्माजी को इसका बोध बना रहता है कि वे निमित्तमात्र हैं जिससे वे अपने को परमेश्वर न मान बैठें।

भक्तजन भगवान् द्वारा प्रदत्त कार्यों में संलग्न रहते हैं और ऐसे कार्य निर्बाध चलते रहते हैं, क्योंकि भगवान् से आदेश जो प्राप्त है। सफलता का श्रेय कर्ता को नहीं बल्कि भगवान् को मिलता है। किन्तु जो अल्पज्ञ हैं, वे सफलता का कारण अपने को मानते हैं और भगवान् को कोई श्रेय नहीं देते। यह अभक्त पुरुषों का लक्षण है।

 
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