श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 9: श्रीभगवान् के वचन का उद्धरण देते हुए प्रश्नों के उत्तर  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक
एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनात्मन: ।
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
एतावत्—यहाँ तक; एव—निश्चय ही; जिज्ञास्यम्—पूछा जाना चाहिए; तत्त्व—परम सत्य; जिज्ञासुना—विद्यार्थी द्वारा; आत्मन:—स्व का; अन्वय—प्रत्यक्ष; व्यतिरेकाभ्याम्—अप्रत्यक्ष रूप से; यत्—जो भी; स्यात्—सम्भव है; सर्वत्र—सभी जगह तथा सर्वकाल में; सर्वदा—समस्त परिस्थितियों में ।.
 
अनुवाद
 
 जो व्यक्ति परम सत्य रूप श्रीभगवान् की खोज में लगा हो उसे चाहिए कि वह समस्त परिस्थितियों में सर्वत्र और सर्वदा प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष दोनों ही प्रकार से इसकी खोज करे।
 
तात्पर्य
 जैसा पिछले श्लोक में कहा गया है भक्तियोग के रहस्य को जान लेना ही जिज्ञासु के लिए समस्त जिज्ञासाओं की परम अवस्था या उनका परम लक्ष्य है। प्रत्येक व्यक्ति भिन्न-भिन्न ढंग से आत्म-साक्षात्कार की खोज में लगा हुआ है—चाहे वह कर्म-योग से हो, ज्ञानयोग से हो, या कि ध्यानयोग या राजयोग से हो, अथवा भक्तियोग से हो। प्रत्येक चेतनायुक्त जीवात्मा का कर्तव्य है कि आत्म-साक्षात्कार में प्रवृत्त हो। जो चेतना में उन्नत है, वह निश्चय ही आत्मा के विषय में, विश्व के विषय में तथा जीवन के समस्त क्षेत्रों के विषय में—यथा सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आचार सम्बन्धी विषयों तथा उनकी विविध शाखाओं के विषय में जिज्ञासा करता है। किन्तु यहाँ पर तो ऐसी समस्त जिज्ञासाओं के लक्ष्य को बताया गया है।

वेदान्त सूत्र दर्शन जीवन विषयक इसी जिज्ञासा से प्रारम्भ होता है और भागवत ऐसी समस्त जिज्ञासाओं का इस बिन्दु तक अथवा समस्त जिज्ञासाओं के रहस्य का उत्तर देता है। ब्रह्माजी चाहते थे कि भगवान् उन्हें पूरी तरह शिक्षित कर दें और यहाँ पर भगवान् द्वारा दिया गया उत्तर चार संक्षिप्त श्लोकों में अहमेव श्लोक से लेकर एतावदेव तक है। यही आत्म-साक्षात्कार विधियों का समापन है। अन्धकार में चकाचौंध से मोहग्रस्त होने के कारण मनुष्य यह नहीं जान पाते कि जीवन का चरम लक्ष्य श्रीभगवान् विष्णु हैं; फलस्वरूप प्रत्येक प्राणी अनियन्त्रित इन्द्रियों द्वारा घुमाया-फिराया जाकर इस संसार के गहनतम अंधकार में धँसता जाता है। समग्र भौतिक संसार इन्द्रिय-तृप्ति, मुख्यतया कामवासना पर आधारित कामनाओं के कारण उत्पन्न हुआ है फलस्वरूप ज्ञान की समस्त प्रगति के बावजूद समस्त जीवों का अन्तिम लक्ष्य इन्द्रिय-तृप्ति ही रहता है। किन्तु यहाँ पर वास्तविक जीवन लक्ष्य बताया गया है, जिसे भक्तियोग के ज्ञान में दक्ष प्रामाणिक गुरु या जीवित भागवत जीवन के जीवन्त पुरुष समक्ष जिज्ञासा करके जानना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति अनेक प्रकार की धर्म सम्बन्धी जिज्ञासाओं में लगा हुआ है, किन्तु श्रीमद्भागवत आत्म-साक्षात्कार के समस्त जिज्ञासुओं को उत्तर प्रदान करने वाला है। जीवन का यह परम-लक्ष्य कठोर परिश्रम अथवा लगन के बिना नहीं खोजा जा सकता। जो व्यक्ति ऐसी सच्ची जिज्ञासाओं से प्रेरित होता हो उसे चाहिए कि ब्रह्माजी की शिष्य-परम्परा के प्रामाणिक गुरु से पूछे। यही इस श्लोक में निर्देशित है। चूँकि भगवान् ने इस रहस्य को ब्रह्माजी के समक्ष प्रकट किया था, अत: आत्म-साक्षात्कार सम्बन्धी सारी जिज्ञासाएँ ऐसे गुरु के समक्ष प्रकट की जानी चाहिए, जो शिष्य-परम्परा से मान्य भगवान् का सीधा प्रतिनिधि हो। ऐसा प्रामाणिक गुरु शास्त्रों के प्रमाण के आधार पर प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से सारी बात को स्पष्ट करने में समर्थ होता है। यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति को छूट है कि वह इस सम्बन्ध में शास्त्रों का अवलोकन करे, किन्तु फिर भी उसे प्रामाणिक गुरु के पथ-प्रदर्शन की आवश्यकता पड़ती है। इस श्लोक में यही आदेश है। प्रामाणिक गुरु भगवान् का सबसे अधिक विश्वासपात्र प्रतिनिधि होता है, अत: मनुष्य को चाहिए कि गुरु से उसी भाव से आदेश प्राप्त करे जिस प्रकार ब्रह्माजी ने भगवान् श्रीकृष्ण से प्राप्त किया था। उस शिष्य-परम्परा में प्रामाणिक गुरु कभी भी अपने को भगवान् नहीं कहता, यद्यपि ऐसा गुरु भगवान् से भी बड़ा होता है, क्योंकि वह अपने व्यक्तिगत अनुभव से भगवान् को दूसरों को सौंप सकता है। भगवान् को केवल शिक्षा या उर्वर मस्तिष्क के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता, किन्तु प्रामाणिक गुरु के पारदर्शी माध्यम से जिज्ञासु को उसकी प्राप्ति हो सकती है।

शास्त्रों में इसके सीधे निर्देश प्राप्त हैं, किन्तु जीवात्माएँ अन्धकार में चकाचौंध के द्वारा मोहग्रस्त होने के कारण अंधी होने से शास्त्रों के सत्य को खोज पाने में अक्षम रहती हैं। उदाहरणार्थ, भगवद्गीता में सारा आदेश भगवान् श्रीकृष्ण की ओर लक्षित है, किन्तु ब्रह्माजी की परम्परा में प्रामाणिक गुरु के अभाव में, अथवा अर्जुन जैसे प्रत्यक्ष श्रोता के अभाव में, अनेक अवैध पुरुष अपनी सनकों की तुष्टि के लिए इस दिव्य ज्ञान को तोड़-मोड़ कर प्रस्तुत करते हैं। निस्सन्देह, परव्योम के क्षितिज में भगवद्गीता सर्वाधिक प्रकाशमान नक्षत्र है, किन्तु इस महान् ज्ञान-ग्रंथ की व्याख्याएँ इतनी बुरी तरह से तोड़ी- मरोड़ी गई हैं कि भगवद्गीता का प्रत्येक जिज्ञासु भौतिक चमक-दमक के अंधकार में अभी भी पड़ा हुआ है। ऐसे जिज्ञासुओं को शायद ही भगवद्गीता से प्रकाश मिल पाता हो। गीता में मुख्य रूप से वही आदेश दिया गया है, जो भागवत के इन चार मूल श्लोकों में प्राप्त है, किन्तु अनधिकृत व्यक्तियों द्वारा इसकी गलत तथा फैशनपरस्त व्याख्या से कोई सही निष्कर्ष तक नहीं पहुँच पाता। भगवद्गीता

(१८.६१) में स्पष्ट उल्लेख है—

ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥

भगवान् परमात्मा रूप में सभी जीवों के हृदयों में स्थित हैं और अपनी बहिरंगा शक्ति के द्वारा संसार के समस्त प्राणियों को नियन्त्रण में रखते हैं। अत: यह स्पष्ट उल्लेख है कि भगवान् परम नियन्ता हैं और जीवात्माएँ भगवान् द्वारा नियन्त्रित हैं। उसी भगवद्गीता (१८.६५) में भगवान् आदेश देते हैं कि—

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।

मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥

इससे स्पष्ट है कि भगवान् का आदेश है कि मनुष्य को भगवतो-मुखी, भगवान् का भक्त, उन्हीं का उपासक होना चाहिए और भगवान् श्रीकृष्ण को ही नमस्कार करना चाहिए। ऐसा करने से भक्त निस्संदेह भगवान् के धाम को प्राप्त होगा।

अप्रत्यक्ष रूप से यह कहा जाता है कि मानव समाज की सम्पूर्ण वैदिक संरचना इस प्रकार बनी हुई है कि प्रत्येक व्यक्ति भगवान् के पूरे शरीर के अंग-प्रत्यंग के रुप में कार्यकरता है। ज्ञानी पुरुष अर्थात् ब्राह्मण भगवान् के मुख पर स्थित हैं शासक वर्ग अर्थात् क्षत्रिय उनकी बाहुओं पर व्यापारी वर्ग अर्थात् वैश्य भगवान् के कटि भाग पर तथा श्रमिक वर्ग या शूद्र भगवान् के पाँवों पर स्थित हैं। अत: सम्पूर्ण सामाजिक ढाँचा भगवान् का शरीर है और शरीर के विविध भाग—यथा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र सभी मिलकर भगवान् के पूरे शरीर की सेवा करने के निमित्त हैं, अन्यथा ये भाग एकता की परम चेतना में समन्वित किए जाने के योग्य नहीं रह जाते। श्रीभगवान् से सम्बद्ध सभी की समन्वित सेवा से विश्वचेतना प्राप्त की जा सकती है, अत: बड़े से बड़े वैज्ञानिक, महान् दार्शनिक, चिन्तक, राजनीतिज्ञ, उद्योगपति, समाज सुधारक इत्यादि तक भी इस संसार के अशान्त समाज को कोई राहत नहीं दिला सकते, क्योंकि वे भागवत के इस श्लोक में वर्णित सफलता के रहस्य अर्थात् भक्तियोग के रहस्य को नहीं जानते। भगवद्गीता (७.१५) में भी कहा गया है : न मां दुष्कृतिनो मूढा: प्रपद्यन्ते नराधम:।

माययाऽपहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिता: ॥

चूँकि मानव समाज के तथाकथित बड़े-बड़े नेता भक्तियोग के इस महान् ज्ञान से अनजान रहते हैं और भगवान् की बहिरंगा शक्ति से मोहित होकर सदैव इन्द्रिय-तृप्ति के निकृष्ट कार्यों में संलग्न रहते हैं, अत: वे परमेश्वर की श्रेष्ठता के कट्टर विरोधी होते हैं और वे भगवान् की शरण में जाना कभी स्वीकार नहीं करते, क्योंकि वे मूर्ख, बदमाश तथा नराधम हैं। ऐसे श्रद्धारहित नास्तिक चाहे उन्हें कितनी ही उच्च शिक्षा प्राप्त क्यों न हो, वास्तव में संसार के सबसे बड़े मूर्ख हैं, क्योंकि बहिरंगा प्रकृति के प्रभाव से उनका सारा ज्ञान व्यर्थ हो जाता है। अत: सारा आधुनिक समुन्नत ज्ञान कुत्ते-बिल्लियों के समान इन्द्रिय-तुष्टि के लिए आपस में लडऩे में लग जाता है और विज्ञान, दर्शन, कला, राष्ट्रीयता, आर्थिक विकास, धर्म के सम्बन्ध में अर्जित सारा ज्ञान तथा सारे महान् कार्य उसी प्रकार व्यर्थ कर दिये जाते हैं जिस प्रकार शव के लिए प्रयुक्त वस्त्र। शव-शय्या को विविध प्रकार के वस्त्रों से ढक कर मूर्ख जनता से झूठी वाहवाही लूटने से कोई लाभ नहीं। अत: श्रीमद्भागवत बारम्बार कहता है कि भक्तियोग का पद प्राप्त किये बिना मानव समाज के सारे कार्यकलाप निष्फल होते हैं। कहा गया है—

पराभवस्तावदबोधजातो यावन्न जिज्ञासत आत्मतत्त्वम्।

यावत्क्रियास्तावदिदं मनो वै कर्मात्मकं येन शरीरबन्ध: ॥

(भागवत ५.५.५) जब तक मनुष्य आत्म-साक्षात्कार की जिज्ञासा की उपेक्षा करता है तब तक बड़े से बड़े भौतिक कार्यकलाप पराजय-स्वरूप होते हैं, क्योंकि मानव जीवन का उद्देश्य ऐसे अवांछित तथा व्यर्थ के कार्यों से पूर्ण नहीं होता। मनुष्य शरीर का कार्य भव-बन्धन से मुक्त होना है, किन्तु जब तक कोई भौतिक कार्यों में लीन रहेगा तब तक उसका मन पदार्थ की भँवर में घूमता रहेगा और वह जन्म-जन्मान्तर देह के बन्धन में फँसता रहेगा।

एवं मन: कर्मवशं प्रयुङ्क्ते अविद्ययात्मन्युपधीयमाने।

प्रीतिर्न यावन्मयि वासुदेवे न मुच्यते देहयोगेन तावत् ॥

(भागवत ५.५.६) मन के ही कारण विविध देह धारण करके, सभी प्रकार की भौतिक यातनाएँ भोगनी होती हैं। अत: जब तक मन सकाम कर्म में लीन रहता है, उसे अज्ञान में लगा हुआ समझना चाहिए, अत: जब तक कि मनुष्य परम पुरुष भगवान् वासुदेव के प्रति दिव्य प्रेम उत्पन्न नहीं कर लेता तब तक वह पुन:पुन: विभिन्न देहों में भवबन्धन में पड़ता रहेगा। परम पुरुष वासुदेव के दिव्य नाम, गुण, रूप तथा लीलाओं में मग्न रहने का अर्थ है मन की वृत्ति को पदार्थ से परम ज्ञान में बदल देना जिससे परम बोध के पथ पर अग्रसर हुआ जा सकता है और इस प्रकार भवबन्धन तथा विभिन्न देहों के जाल से छुटकारा पाया जा सकता है।

अत: श्रील जीव गोस्वामी प्रभुपाद सर्वत्र सर्वदा शब्दों की टीका इस अर्थ में करते हैं कि भक्तियोग के नियम सभी परिस्थितियों के लिए उपयुक्त हैं, अर्थात् भक्तियोग समस्त शास्त्रों में संस्तुत है यह समस्त अधिकारियों द्वारा प्रयुक्त है यह सभी स्थानों पर महत्त्व रखता है यह समस्त कार्य-कारणों में उपयोगी है इत्यादि। जहाँ तक सभी शास्त्रों का सम्बन्ध है, वे स्कन्द पुराण से ब्रह्मा तथा नारद की कथा का निम्न उद्धरण देते हैं—

संसारेऽस्मिन् महाघोरे जन्ममृत्युसमाकुले।

पूजनं वासुदेवस्य तारकं वादिभि: स्मृतम् ॥

यह संसार अंधकार तथा भय के साथ-साथ जन्म-मरण तथा विभिन्न चिन्ताओं से पूर्ण है और इस विशाल जाल से निकलने का एकमात्र उपाय भगवान् वासुदेव की दिव्य प्रेमाभक्ति को स्वीकार करना है। सभी वर्ग के दार्शनिकों ने इसे स्वीकार किया है।

श्रील जीव गोस्वामी एक अन्य व्यापक उद्धरण देते हैं, जो पद्म पुराण, स्कन्द पुराण तथा लिंग पुराण—इन तीनों में पाया जाता है। यह इस प्रकार है—

आलोड्य सर्वशास्त्रानि विचार्य च पुन: पुन:।

इदम् एकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायण: सदा ॥

“शास्त्रों के आलोडन तथा उनके बारम्बार पुनरीक्षण से यह निष्कर्ष निकलता है कि भगवान् नारायण ही परम सत्य हैं, अत: केवल उन्हीं की पूजा करनी चाहिए।”

यही सत्य अप्रत्यक्ष रूप में गरुड़ पुराण में इस प्रकार बताया गया है—

पारंगतोऽपि वेदानां सर्वशास्त्रार्थवेद्यपि।

यो न सर्वेश्वरे भक्तस्तं विद्यात् पुरुषाधमम् ॥

“भले ही कोई समस्त वेदों का अवगाहन कर चुका हो और समस्त शास्त्रों में निपुण हो, किन्तु यदि वह परमेश्वर का भक्त नहीं है, तो उसे नराधम समझना चाहिए।” इसी प्रकार श्रीमद्भागवत (५.१८.१२) में भी अपरोक्ष रीति से कहा गया है—

यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना सर्वैगुणैस्तत्र समासते सुरा:।

हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा मनोरथेनासति धावतो बहि: ॥

जिसमें भगवान् के प्रति अटल भक्ति है उसमें देवताओं के समस्त सद्गुण रहते हैं, किन्तु इसके विपरीत जो भगवान् का भक्त नहीं है, वह कल्पना (चिन्तन) के अन्धकार में भटकता रहता है और नाशवान भौतिकता में लगा रहता है। श्रीमद्भागवत (११.११.१८) का कथन है— शब्दब्रह्मणि निष्णातो न निष्णायात् परे यदि।

श्रमस्तस्य श्रमफलो ह्यधेनुमिव रक्षत: ॥

“भले ही कोई वेदों के समस्त दिव्य साहित्य में निष्णात् हो, किन्तु यदि वह परमेश्वर को नहीं जानता तो यह समझना चाहिए कि उसकी सारी शिक्षा पशु का भार उठाने तुल्य अथवा दूध न देने वाली गाय के पालने के समान है।”

इसी प्रकार भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति करने की छूट प्रत्येक व्यक्ति यहाँ तक कि स्त्री, शूद्र, वन्य जातियों या अन्य किसी भी पापमय स्थितियों में जी रहे जीवों के लिए भी है। ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां स्त्रीशूद्रहूणशबरा अपि पापजीवा:।

यद्यद्भुतक्रमपरायणशीलशिक्षा स्तिर्यग्जना अपि किमु श्रुतधारणा ये ॥

(भागवत २.७.४६) यदि भगवद्भक्ति में निष्णात् प्रामाणिक गुरु द्वारा नराधमों को भी शिक्षा मिले तो वे भक्ति के उच्चस्थ पद तक उठ सकते हैं। जब नराधम तक भी इतने ऊँचे उठ सकते हैं, तो जो वैदिक ज्ञान में निष्णात् सर्वोच्च हैं उनके विषय में कुछ कहना ही क्या है! निष्कर्ष यह निकला कि भगवद्भक्ति के द्वार सबों के लिए खुले हैं, चाहे वे जो भी हों। यह सब प्रकार के लोगों द्वारा भक्ति से लाभ उठाये जाने की पुष्टि है।

अत: हर एक के लिए, यहाँ तक कि यदि वह मनुष्य न हो तो भी, प्रामाणिक गुरु की शिक्षा द्वारा प्राप्त पूर्णज्ञान सहित भगवान् की भक्ति की सलाह दी गई है। गरुड़ पुराण में इसकी पुष्टि इस प्रकार हुई है—

कीटपक्षिमृगाणां च हरौ संन्यस्तचेतसाम्।

ऊर्ध्वामेव गतिं मन्ये किं पुनर्ज्ञानिनां नृणाम् ॥

“जहाँ कीटों, पक्षियों तथा पशुओं तक को भगवान् की दिव्य भक्ति के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित होने पर उच्चतम सिद्धि-पद तक ऊपर उठने का आश्वासन प्राप्त हो, वहाँ मनुष्यों में ज्ञानियों के विषय में क्या कहा जाय?”

अत: भगवान् की भक्तिमय सेवा करने के लिए समुचित योग्य पात्रों के ढूँढ़े जाने की आवश्यकता नहीं होती है चाहे वे शिष्ट हों या अशिक्षित, विद्वान हों अथवा मूर्ख आसक्त हों या विरक्त मुक्त हों या मुक्ति के कामी भक्ति करने में सक्षम हों या अक्षम। सभी लोग उचित पथ-प्रदर्शन से भक्ति करते हुए परम पद को प्राप्त हो सकते हैं। इसकी पुष्टि भगवद्गीता (९.३०, ३२) में इस प्रकार हुई है— अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।

साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स: ॥

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु: पापयोनय:।

स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥

यदि समस्त प्रकार के पापकर्मों में रत कोई व्यक्ति उचित पथ-निर्देशन में भगवान् की भक्ति करता है, तो उसे निस्सन्देह परम पवित्र पूर्ण पुरुष समझना चाहिए। अत: कोई भी पुरुष या स्त्री, चाहे वह जो भी हो और जैसा भी हो—यहाँ तक कि पतित स्त्री, शूद्र, वैश्य या इनसे भी निम्नपुरुष, यदि भगवान् के चरणकमलों की निष्ठापूर्वक शरण ग्रहण करता है, तो वह भगवान् के धाम को लौटकर जीवन की परम सिद्धि प्राप्त कर सकता है। यही निष्ठा एकमात्र पात्रता (योग्यता) है, जिससे वह जीवन के उच्च पूर्ण पद को प्राप्त कर सकता है और जब तक ऐसी निष्ठा जागृत नहीं होती तब तक भौतिक दृष्टि से शुद्धि, अथवा अशुद्धि, ज्ञान अथवा अज्ञान में अन्तर दिखता है। अग्नि तो सदैव अग्नि रहती है, अत: जब कोई जाने या अनजाने अग्नि को छूता है, तो अग्नि बिना भेदभाव के अपना कार्य करती है। नियम है—हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तैरपि स्मृत:। सर्वशक्तिमान भगवान् भक्त के सभी प्रकार के समस्त पापफलों को शुद्ध कर सकता है, जिस प्रकार सूर्य अपनी शक्तिशाली किरणों से सभी प्रकार के संदूषणों को संदमित करता है। “भगवान् के शुद्ध भक्त पर भौतिक सुख के आकर्षण का रंग नहीं चढ़ता”। शास्त्रों में सैकड़ों-हजारों ऐसी सूक्तियाँ हैं—आत्मारामाश्च मुनय:—स्वरूपसिद्ध पुरुष भी भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति के प्रति अकृष्ट होते हैं। केचित् केवलया भक्त्या वासुदेव परायणा:— केवल श्रवण तथा कीर्तन से मनुष्य भगवान् वासुदेव का परम भक्त बन जाता है। न चलति भगवत्पदारविन्दाल्लवनिमिषार्धम् अपि स वैष्णवाग्रय:—जो व्यक्ति भगवान् के चरणकमलों से एक क्षण के लिए भी नहीं हटता उसे समस्त वैष्णवों में सबसे बड़ा समझा जाता हैं। भगवत्पार्षदतां प्राप्ते मत्सेवया प्रतीतं ते—शुद्ध भक्तों को भगवान् की संगति प्राप्त करने का पूरा-पूरा विश्वास रहता है और इस तरह वे भगवान् की दिव्य सेवा में निरन्तर लगे रहते हैं। अत: समस्त भूखण्डों, लोकों तथा ब्रह्माण्डों में भक्तियोग प्रचलित है। यही श्रीमद्भागवत तथा अन्य शास्त्रों का कथन है। सर्वत्र का अर्थ है भगवान् की सृष्टि के प्रत्येक भाग में। भगवान् की सेवा समस्त इन्द्रियों से या मन से की जा सकती है। दक्षिण भारत में जिस ब्राह्मण ने केवल अपने मन के बल पर भगवान् की सेवा की थी उसे यथार्थ में भगवान् के दर्शन हुए। जो भक्त अपनी किसी भी इन्द्रिय को पूर्णत: भक्ति गुण में लगाता है उसकी सफलता निश्चित है। भगवान् की सेवा किसी भी वस्तु से—यहाँ तक कि सर्व साधारण वस्तु जैसे फल, फूल, पत्ती या कि थोड़े से जल द्वारा जो संसार भर में सर्वत्र बिना मूल्य के ही उपलब्ध हैं, की जा सकती है। भगवान् ब्रह्माण्ड भर के जीवों द्वारा इसी प्रकार सेवित हैं। केवल श्रवण, कीर्तन या उनकी लीलाओं के पठन से, पूजन से या उन्हें मानने से ही उनकी सेवा हो जाती है।

भगवद्गीता में कहा गया है कि मनुष्य स्वकीय कर्मों के फल अर्पण करने से भी भगवान् की सेवा कर सकता है, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि वह करता क्या है। सामान्य रूप से लोग कह सकते हैं कि वे जो भी करते हैं वह ईश्वर की प्रेरणा से करते हैं, किन्तु यही सब कुछ नहीं है। मनुष्य को वास्तव में भगवान् के सेवक के रूप में कार्य करना चाहिए। भगवद्गीता (९.२७) में भगवान् कहते हैं—

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।

यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥

जो तुम्हें अच्छा लगे या आसान लगे, वही करो जो चाहो सो खाओ; जो भी यज्ञ करना हो करो जो भी दान देना हो दो और जो भी तपस्या करनी हो करो किन्तु प्रत्येक कार्य केवल भगवान् के लिए होना चाहिए। यदि तुम कोई कार्य करते हो या कोई नौकरी स्वीकार करते हो तो भगवान् के हेतु करो। जो भी खाओ, वही भगवान् को भी अर्पित करो और आश्वस्त रहो कि वे उस भोजन को पाने के बाद तुम्हें लौटा देंगे। वे परम पूर्ण हैं, अत: जो भी भक्त द्वारा अर्पित किया जाता है उसे वे भक्त के प्रेमवश ग्रहण करते हैं, किन्तु पुन: प्रसाद के रूप में भक्त को लौटा देते हैं जिसे खाकर वह प्रसन्न रहे। दूसरे शब्दों में, ईश्वर के सेवक बनो और उसी भाव में शान्तिपूर्वक रहकर अन्त में भगवान् के धाम को प्राप्त करो।

स्कन्द पुराण में कहा गया है—

यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु।

नूनं सम्पूर्णतामेति सद्यो वन्दे तमच्युतम् ॥

“मैं अच्युत भगवान् को नमस्कार करता हूँ, क्योंकि केवल उनके पवित्र नाम के स्मरण या उच्चारण से समस्त तपों, सकाम कर्मों, यज्ञों का फल प्राप्त होता है और इस विधि का सर्वत्र पालन किया जा सकता है।” भागवत (२.३.१०) में भी कहा गया है—

अकाम: सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधी:।

तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ॥

“मनुष्य को चाहिए कि वह पूर्ण सिद्धि के लिए अच्युत भक्तियोग पथ का अनुसरण करे, भले ही वह सकाम हो अथवा निष्काम”। मनुष्य को प्रत्येक देव तथा देवी की पूजा करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि भगवान् उन सबों के मूलरूप हैं। जिस प्रकार वृक्ष की जड़ों को सींचने से उसकी समस्त टहनियाँ तथा पत्तियाँ हरी-भरी हो जाती हैं उसी प्रकार भगवान् की सेवा करने से अन्य सभी देवों तथा देवियों की सेवा बिना किसी प्रयास के, हो जाती है। भगवान् सर्वव्यापी हैं, अत: उनकी सेवा भी सर्वव्यापी है। इस तथ्य का समर्थन स्कन्द पुराण में इस प्रकार हुआ है—

अर्चिते देवदेवेशे शंखचक्रगदाधरे।

अर्चिता: सर्वदेवा: स्युर्यत: सर्वगतो हरि: ॥

जब शंख, चक्र, गदा तथा पद्मधारी श्रीभगवान् की पूजा की जाती है, तो अन्य सभी देवों की पूजा स्वत: हो जाती है, क्योंकि श्रीभगवान् हरि सर्वव्यापी हैं। अत: सभी प्रकार से प्रत्येक प्राणी ऐसी भगवद्-भक्ति से लाभान्वित होता है। ऐसे कार्य से भगवान् की पूजा करने वाला, पूजित होने वाले भगवान्, जिस हेतु पूजा की जाती है, पूर्ति का स्रोत, जहाँ पूजा की जाती है—ये सभी लाभान्वित होते हैं।

यहाँ तक कि भौतिक संसार के प्रलय के समय भी भक्तियोग की विधि व्यवहृत हो सकती है। कालेन नष्टा प्रलये वाणीयम्—प्रलय के समय भगवान् की पूजा की जाती है, क्योंकि वे वेदों की नष्ट होने से रक्षा करते हैं। वे प्रत्येक युग में पूजे जाते हैं। श्रीमद्भागवत (१२.३.५२) में कहा गया है—

कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखै:।

द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात् ॥

विष्णु पुराण में लिखा गया है—

स हानिस्तन्महच्छिद्रं स मोह: स च विभ्रम:।

यन्मुहूर्तं क्षणं वापि वासुदेवं न चिन्तयेत् ॥

“यदि एक क्षण के लिए भी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान, वासुदेव का स्मरण नहीं किया जाता तो यह सबसे बड़ी हानि है, सबसे बड़ा भ्रम है और सबसे बड़ी विडम्बना है।” जीवन की समस्त अवस्थाओं में भगवान् पूजे जा सकते हैं। उदाहरणार्थ, महाराज प्रह्लाद तथा महाराज परीक्षित ने अपनी माताओं के गर्भ में भी भगवान् की पूजा की; ध्र ुव महाराज ने केवल पाँच वर्ष की आयु में भगवान् की पूजा की; महाराज अम्बरीष ने अपनी पूर्ण युवावस्था में भगवान् की पूजा की और महाराज धृतराष्ट्र ने अपनी वृद्धायु में अत्यन्त विक्षिप्तावस्था में भी भगवान् की पूजा की। अजामिल ने मृत्यु के सन्निकट रहते हुए भी भगवान् की पूजा की और चित्रकेतु ने स्वर्ग तथा नरक में रहकर भी भगवान् की पूजा की। नरसिंह पुराण में कहा गया है कि जब नरक में रहने वालों ने भगवान् के पवित्र नाम का जप प्रारम्भ किया, तो वे नरक से स्वर्ग जाने लगे। दुर्वासा मुनि ने भी इस तथ्य की पुष्टि की है—मुच्येत यन्नाम्न्युदिते नारकोऽपि—केवल भगवन्नाम-जप से नरक के वासी अपनी-अपनी नारकीय यातना से मुक्त हो गये। अत: शुकदेव गोस्वामी द्वारा महाराज परीक्षित को जो उपदेश दिया गया उसका निष्कर्ष श्रीमद्भागवत (२.१.११) में इस प्रकार है—

एतन्निर्विद्यमानानामिच्छतामकुतोभयम्।

योगिनां नृप निर्णीतं हरेर्नामानुकीर्तनम् ॥

“हे राजन्! अन्तत: यह तय हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति को, चाहे वह संन्यासी हो, योगी हो अथवा सकाम कर्मी हो, वांछित फल की प्राप्ति के लिए निर्भय होकर भगवान् के पवित्र नाम का जप करना चाहिए।”

इसी प्रकार विभिन्न शास्त्रों में अप्रत्यक्ष रूप से इंगित किया गया है—

१. भले ही कोई समस्त वेदों तथा शास्त्रों में निष्णात् हो, किन्तु यदि वह परमेश्वर का भक्त नहीं है, तो वह नराधम माना जाता है।

२. गरुड़ पुराण, बृहन्नारदीय पुराण तथा पद्म पुराण में भी इसी की पुनरावृत्ति की गई है—जो भगवद्भक्ति से रहित है उसके वैदिक ज्ञान तथा तपस्या से क्या लाभ? ३. हजारों प्रजापतियों की एक भगवद्भक्त से तुलना कैसी? ४. शुकदेव गोस्वामी ने श्रीमद्भागवत (२.४.१७) में कहा है कि भगवद्भक्ति के बिना न संन्यासी, न ही दयालु, प्रसिद्ध व्यक्ति, महान् दार्शनिक, महान् तान्त्रिक या अन्य कोई भी व्यक्ति वांछित फल नहीं पा सकते।

५. भले ही कोई स्थान स्वर्ग से भी अधिक महिमामय हो, किन्तु यदि वहाँ वैकुण्ठ के स्वामी या उनके भक्त की महिमा का गान नहीं होता तो उसको तुरन्त छोड़ देना चाहिए। ६. शुद्ध भक्त भगवान् की सेवा में लगे रहने के लिए पाँच प्रकार की मुक्तियों को अस्वीकार कर देता है।

अत: अन्तिम निष्कर्ष यही है कि सर्वत्र तथा सर्वदा भगवान् की महिमा का गान होना चाहिए। मनुष्य को चाहिए कि उनकी महिमा का श्रवण, कीर्तन तथा स्मरण करे, क्योंकि जीवन की परम सिद्ध अवस्था यही है। सकाम कर्म तो भोग्य शरीर तक सीमित है योग-शक्तियों की प्राप्ति तक, योग शुष्क दर्शन दिव्य ज्ञान की उपलब्धि तक और जहाँ तक दिव्य ज्ञान का सम्बन्ध है, वह मोक्ष-लाभ तक सीमित है। यदि इन सबको सम्पन्न किया भी जाता है, तो इनके मार्ग में त्रुटियों के होने की सम्भावना रहती है। किन्तु भगवान् की दिव्य भक्ति को ग्रहण करने की न तो कोई सीमा है न ही नीचे गिरने का कोई भय है। भगवत्कृपा से यह विधि स्वत: अन्तिम अवस्था को प्राप्त होती है। भक्ति की प्रारम्भिक अवस्था में ज्ञान आवश्यक है, किन्तु उच्चतर अवस्था में ऐसे ज्ञान की कोई आवश्यकता नहीं होती। अत: उन्नति का सर्वोत्तम तथा निश्चित पथ भक्तियोग ही है।

कभी-कभी श्रीमद्भागवत के उपर्युक्त चार श्लोकों के निचोड़ का उपयोग निर्विशेषवादी अपने पक्ष के समर्थन हेतु करता है, किन्तु ध्यान देना होगा कि इन चारों श्लोकों का वर्णन सर्वप्रथम श्रीभगवान् ने स्वयं किया था। अत: भगवान् के विषय में कोई धारणा न होने से निर्विशेषवादी को उनमें प्रवेश करने की कोई गुंजाईश नहीं है। अत: इन श्लोकों के निचोड़ की निर्विशेषवादी चाहे जो भी व्याख्या करे, वह ब्रह्मा से प्राप्त शिष्य-परम्परा में दीक्षित व्यक्तियों द्वारा मान्य नहीं होगी जैसाकि निम्नलिखित श्लोकों से स्पष्ट हो जाएगा। इसके अतिरिक्त श्रुति पुष्टि करती है कि जिसे अपने शैक्षणिक ज्ञान का गर्व होता है उसके समक्ष श्रीभगवान् कभी प्रकट नहीं होते। कठोपनिषद् के (१.२.२३) श्रुति मन्त्र का स्पष्ट कथन है—

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुधा श्रुतेन।

यमेवैष वृणुते तेन लभ्य स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ॥

यह सारी बात श्रीभगवान् स्वयं कहते हैं, अत: जिसकी पहुँच भगवान् के सगुण रूप तक नहीं है, वह श्रीमद्भागवत के सार को शिष्य-परम्परा में किसी भागवत से शिक्षा ग्रहण किये बिना शायद ही समझ सके।

 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥