श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 9: श्रीभगवान् के वचन का उद्धरण देते हुए प्रश्नों के उत्तर  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक
आत्मतत्त्वविशुद्ध्यर्थं यदाह भगवानृतम् ।
ब्रह्मणे दर्शयन् रूपमव्यलीकव्रताद‍ृत: ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
आत्म-तत्त्व—ईश्वर का ज्ञान अथवा जीवात्मा का ज्ञान; विशुद्धि—शुद्धीकरण; अर्थम्—लक्ष्य; यत्—जो; आह—कहा; भगवान्—भगवान् ने; ऋतम्—सचमुच; ब्रह्मणे—ब्रह्माजी को; दर्शयन्—दिखलाकर; रूपम्—नित्य रूप; अव्यलीक— निष्कपट भाव से; व्रत—संकल्प; आदृत:—पूजित ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, भगवान् ने ब्रह्माजी की भक्तियोग की निष्कपट तपस्या से अत्यन्त प्रसन्न होकर उनके समक्ष अपना शाश्वत दिव्य रूप प्रकट किया और बद्धजीव की शुद्धि के लिए यही परम लक्ष्य भी है।
 
तात्पर्य
 आत्म-तत्त्व ईश्वर तथा जीवात्मा दोनों ही का विज्ञान है। परमेश्वर तथा जीवात्मा दोनों ही आत्मा कहलाते हैं। परमेश्वर परमात्मा कहलाते हैं और जीवात्मा आत्मा, ब्रह्म या जीव कहलाता है। परमात्मा तथा जीव भौतिक शक्ति (माया) से परे होने के कारण आत्मा कहलाते हैं। अत: शुकदेव गोस्वामी ने इस श्लोक की व्याख्या परमात्मा तथा जीवात्मा दोनों के सत्य की शुद्धि के उद्देश्य से की है। साधारणतया, लोगों की इन दोनों के बारे में बहुत सी मिथ्या धारणाएँ हैं। जीवात्मा की भ्रान्त धारणा भौतिक शरीर को शुद्ध आत्मा के रूप में पहचानना है और परमात्मा के बारे में भ्रान्त धारणा उसे जीवात्मा के समकक्ष मानना है। किन्तु ये दोनों भ्रान्तियाँ भक्तियोग के एक ही प्रहार से ध्वस्त हो सकती हैं जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश में सूर्य तथा सूर्य प्रकाश के नीचे का सारा लोक दिखाई पडऩे लगता है। अन्धकार में न तो कोई सूर्य को देख पाता है, न अपने आपको और न ही जगत को, किन्तु सूर्य के प्रकाश में वह सूर्य को, अपने आपको तथा अपने चारों ओर के जगत को देख सकता है। अत: श्रील शुकदेव गोस्वामी कहते हैं कि इन दोनों भ्रान्तियों को हटाने के लिए भगवान् ने ब्रह्मा के भक्तियोग के निष्कपट प्रण से प्रसन्न होकर उन्हें अपने शाश्वतरूप का दर्शन दिया। भक्तियोग के अतिरिक्त आत्म-तत्त्व को जानने की कोई भी विधि अन्तत: भ्रम सिद्ध होगी।

भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि केवल भक्तियोग के द्वारा उन्हें पूर्ण रूप से जाना जा सकता है और तब आत्म-तत्त्व में प्रवेश सम्भव है। भक्तियोग सम्पन्न करने में ब्रह्माजी ने कठिन तपस्या की थी, अत: वे भगवान् के दिव्य रूप को देख पाये। उनका दिव्य रूप शत-प्रतिशत आध्यात्मिक है और शुद्ध भक्तियोग में समुचित तपस्या के बाद दिव्य दृष्टि से ही उनका दर्शन किया जा सकता है। ब्रह्मा के समक्ष जो रूप प्रकट हुआ था वह इस भौतिक संसार में हमारे द्वारा अनुभव किया जाने वाला रूप नहीं था। ब्रह्माजी ने उतनी कठिन तपस्या ऐसे भौतिक रूप के साक्षात्कार के लिए नहीं की थी। अत: महाराज परीक्षित द्वारा पूछे गये प्रश्न का उत्तर मिल जाता है। भगवान् सच्चिदानन्द स्वरूप अर्थात् शाश्वत ज्ञान से परिपूर्ण और आनन्द से परिपूर्ण हैं। किन्तु जीवात्मा का भौतिक रूप न तो सत् है, न चित् और न आनन्द ही। यही भगवान् के रूप तथा बद्धजीव के रूपों में अन्तर है। किन्तु बद्धजीव अपना चिदानन्द रूप भक्तियोग द्वारा भगवान् का दर्शन करके पुन: प्राप्त कर सकता है।

सारांश यह है कि अविद्या के कारण बद्धजीव अनेक प्रकार के नश्वर भौतिक रूपों में जकड़ा रहता है। किन्तु भगवान् के बद्धात्माओं जैसे नश्वर रूप नहीं होते। वे सदैव चिदानन्द रूप में रहते हैं; यही जीवात्मा तथा परमात्मा में अन्तर है। भक्तियोग के द्वारा इस अन्तर को समझा जा सकता है। तब भगवान् ने ब्रह्मा को चार मूल श्लोकों में श्रीमद्भागवत का सार कह सुनाया। इस प्रकार श्रीमद्भागवत चिन्तकों की सृष्टि नहीं है। श्रीमद्भागवत की ध्वनि दिव्य है और इसकी अनुगूँज वेदों के ही समान है। इस प्रकार श्रीमद्भागवत की कथा भगवान् तथा जीवात्मा दोनों के ज्ञानस्वरूप है। श्रीमद्भागवत का नियमित पाठ करना या उसका श्रवण करना भी भक्तियोग की साधना है और श्रीमद्भागवत की संगति मात्र से बड़ी-से-बड़ी सिद्धि प्राप्त हो सकती है। शुकदेव गोस्वामी तथा महाराज परीक्षित दोनों ने श्रीमद्भागवत के माध्यम से सिद्धि प्राप्त की।

 
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