श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 9: श्रीभगवान् के वचन का उद्धरण देते हुए प्रश्नों के उत्तर  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक
नारद: प्राह मुनये सरस्वत्यास्तटे नृप ।
ध्यायते ब्रह्म परमं व्यासायामिततेजसे ॥ ४५ ॥
 
शब्दार्थ
नारद:—नारद मुनि ने; प्राह—उपदेश दिया; मुनये—मुनि को; सरस्वत्या:—सरस्वती नदी के; तटे—तट पर; नृप—हे राजन; ध्यायते—ध्यानमग्न; ब्रह्म—परम सत्य; परमम्—परमेश्वर; व्यासाय—श्रील व्यासदेव के लिए; अमित—अपार; तेजसे— शक्तिमान को ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, उसी परम्परा में नारद मुनि ने श्रीमद्भागवत का उपदेश अनन्त शक्तिमान उन व्यासदेव को दिया जो सरस्वती नदी के तट पर भक्ति में स्थित होकर परम सत्य, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का ध्यान कर रहे थे।
 
तात्पर्य
 श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कंध के पाँचवें अध्याय में नारद ने व्यासदेव को निम्नलिखित उपदेश दिया है—

अथो महाभाग भवान् अमोघदृक् शुचिश्रवा: सत्यरतो धृतव्रत:।

उरुक्रमस्याखिलबन्धमुक्तये समाधिनानुस्मर तद्विचेष्टितम् ॥

“हे महाभाग्यशाली पवित्र विद्वान! तुम्हारा नाम तथा यश विश्वव्यापी है और तुम अपने निष्कलंक चरित्र तथा अच्युत दृष्टि से परम सत्य में स्थित हो। मैं तुम्हें भगवान् की अतुलनीय लीलाओं का ध्यान करने को कहता हूँ।”

इस प्रकार ब्रह्मसम्प्रदाय की शिष्य-परम्परा में योग ध्यान के अभ्यास की उपेक्षा नहीं की जाती। लेकिन भक्तियोगी होने के कारण भक्त निर्गुण ब्रह्म का ध्यान नहीं धरते। वे तो जैसा यहाँ इंगित किया गया है, परम ब्रह्म (ब्रह्म परमम्) का ध्यान करते हैं। ब्रह्म साक्षात्कार ब्रह्मज्योति से प्रारम्भ होता है और अधिक ध्यान करने से परमात्मा का प्राकट्य होता है। अधिक आगे बढऩे पर भगवान् का साक्षात्कार स्थिर हो जाता है। श्रीनारद मुनि, व्यासदेव के गुरु होने के नाते, व्यासदेव की स्थिति से अवगत थे, अत: उन्होंने प्रमाणित किया कि श्रील व्यासदेव भगवान् की लीलाओं के ध्यान में पूर्ण निष्ठा से स्थित हैं। नारद ने भगवान् की दिव्य लीलाओं का ध्यान करने का उपदेश दिया। निर्विशेष ब्रह्म की कोई लीला नहीं होती, किन्तु सगुण ब्रह्म की लीलाएँ अनेक हैं और ये सारी लीलाएँ दिव्य होती हैं और इनमें भौतिक गुणों का स्पर्श तक नहीं होता। यदि परब्रह्म की लीलाएँ भौतिक होतीं तो नारद ने कभी भी व्यासदेव को उनका ध्यान करने का उपदेश न दिया होता। परमब्रह्म तो भगवान् श्रीकृष्ण हैं, जैसाकि भगवद्गीता में पुष्टि हुई है। भगवद्गीता के दशम अध्याय में अर्जुन को भगवान् श्रीकृष्ण की वास्तविक स्थिति का बोध हुआ तो उन्होंने श्रीकृष्ण को सम्बोधित करते हुए निम्नलिखित शब्द कहे (भगवद्गीता १०.१२-१३)।

परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्।

पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥

आहुस्त्वामृषय: सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा।

असितो देवलो व्यास: स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥

अर्जुन ने भगवान् श्रीकृष्ण का दर्शन करके भगवद्गीता के उद्देश्य का सार संक्षेप में प्रस्तुत करते हुए कहा, “हे प्रभो! आप परम ब्रह्म, परम धाम, पावन परम सत्य और सनातन दिव्य पुरुष हैं। आप चिन्मय आदि देव हैं। नारद, असित, देवल, व्यास आदि सारे ऋषि इसकी पुष्टि करते हैं और आप स्वयं मुझसे इसकी पुष्टि कर रहे हैं।”

जब व्यासदेव ने अपना मन ध्यान में स्थित किया, तो उन्होंने भक्तियोग समाधि में किया और परम पुरुष का माया सहित साक्षात् दर्शन किया। जैसाकि पहले कहा जा चुका है भगवान् की माया भी एक प्रतिरूप है, क्योंकि माया का भगवान् के बिना कोई अस्तित्व नहीं होता। अन्धकार प्रकाश से स्वतंत्र नहीं होता। बिना प्रकाश के अन्धकार का अनुभव नहीं हो पाता। किन्तु यह माया भगवान् से पार नहीं पा सकती, यह उनसे दूर (अपाश्रयम्) खड़ी रहती है।

अत: ध्यान की सिद्धि भगवान् की दिव्य लीलाओं समेत भगवान् का साक्षात्कार (बोध) है। निर्विशेष ब्रह्म का ध्यान ध्यानकर्ता के लिए कष्टकारक होता है जैसाकि भगवद्गीता (१२.५) में कहा गया है—क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्।

 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥