श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 1: विदुर द्वारा पूछे गये प्रश्न  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक
पार्थांस्तु देवो भगवान्मुकुन्दो
गृहीतवान् सक्षितिदेवदेव: ।
आस्ते स्वपुर्यां यदुदेवदेवो
विनिर्जिताशेषनृदेवदेव: ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
पार्थान्—पृथा (कुन्ति) के पुत्रों को; तु—लेकिन; देव:—प्रभु; भगवान्—भगवान्; मुकुन्द:—मुक्तिदाता श्रीकृष्ण ने; गृहीतवान्—ग्रहण कर लिया है; स—सहित; क्षिति-देव-देव:—ब्राह्मण तथा देवता; आस्ते—उपस्थित है; स्व-पुर्याम्—अपने परिवार सहित; यदु-देव-देव:—यदुवंश के राजकुल द्वारा पूजित; विनिर्जित—जीते हुए; अशेष—असीम; नृदेव—राजा; देव:—स्वामी ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् कृष्ण ने पृथा के पुत्रों को अपना परिजन मान लिया है और संसार के सारे राजा श्रीकृष्ण के साथ हैं। वे अपने घर में अपने समस्त पारिवारिक जनों, यदुकुल के राजाओं तथा राजकुमारों के साथ, जिन्होंने असंख्य शासकों को जीत लिया है, उपस्थित हैं और वे उन सबों के स्वामी हैं।
 
तात्पर्य
 विदुर ने धृतराष्ट्र को पृथा के पुत्र, पाण्डवों के साथ राजनीतिक सन्धि करने की बहुत अच्छी सलाह दी। पहली बात जो उन्होंने कही वह यह थी कि भगवान् कृष्ण उनके फुफेरे भाई के रूप में उनके निकट सम्बन्धी हैं। चूँकि कृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, अतएव वे समस्त ब्राह्मणों तथा देवताओं द्वारा पूज्य हैं, जो ब्रह्माण्ड के कार्यकलापों का नियंत्रण करते हैं। इसके साथ ही, भगवान् कृष्ण तथा उनके यदुवंशी पारिवारिक जन संसार के समस्त राजाओं के विजेता हैं।

क्षत्रियगण विभिन्न राज्यों के राजाओं से युद्ध करते थे और उन्हें हराकर उनकी सुन्दर राजकुमारियों का अपहरण कर लेते थे। यह प्रणाली प्रशंसनीय थी, क्योंकि क्षत्रियों तथा राजकुमारियों का विवाह विजेता क्षत्रिय की वीरता के आधार पर होता था। यदुवंश के समस्त राजकुमारों ने वीरता के बल पर इसी तरह से अन्य राजाओं की कन्याओं से विवाह किया था। इस तरह वे संसार के समस्त राजाओं के विजेता थे। विदुर अपने भाई के मन में यह बात बैठा देना चाहते थे कि पाण्डवों से युद्ध करना अनेक खतरों से पूर्ण है, क्योंकि उनकी सहायता श्रीकृष्ण कर रहे थे, जिन्होंने अपने बाल्यकाल में ही कंस तथा जरासन्ध जैसे असुरों को और ब्रह्मा तथा इन्द्र जैसे देवताओं को जीत लिया था। अतएव विश्व की सम्पूर्ण शक्ति पाण्डवों के साथ थी।

 
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