श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 1: विदुर द्वारा पूछे गये प्रश्न  »  श्लोक 16

 
श्लोक
स्वयं धनुर्द्वारि निधाय मायां
र्भ्रातु: पुरो मर्मसु ताडितोऽपि ।
स इत्थमत्युल्बणकर्णबाणै-
र्गतव्यथोऽयादुरु मानयान: ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
स्वयम्—स्वयं; धनु: द्वारि—दरवाजे पर धनुष; निधाय—रखकर; मायाम्—माया, बाहरी प्रकृति को; भ्रातु:—भाई के; पुर:— राजमहल से; मर्मसु—अपने हृदय में; ताडित:—दुखी होकर; अपि—भी; स:—वह (विदुर); इत्थम्—इस तरह; अति- उल्बण—अत्यंत कठोरता से; कर्ण—कान; बाणै:—तीरों से; गत-व्यथ:—दुखी हुए बिना; अयात्—उत्तेजित हुआ; उरु— अत्यधिक; मान-यान:—इस प्रकार विचारते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 इस तरह अपने कानों से होकर वाणों द्वारा बेधे गये और अपने हृदय के भीतर मर्माहत विदुर ने अपना धनुष दरवाजे पर रख दिया और अपने भाई के महल को छोड़ दिया। उन्हें कोई खेद नहीं था, क्योंकि वे माया के कार्यों को सर्वोपरि मानते थे।
 
तात्पर्य
 भगवान् का शुद्ध भक्त ईश्वर की बहिरंगा शक्ति द्वारा उत्पन्न विषम परिस्थिति से कभी विचलित नहीं होता। भगवद्गीता (३.२७) में कहा गया है—
प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वश:।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥

बद्धात्मा बहिरंगा शक्ति के विभिन्न गुणों के प्रभाव के अन्तर्गत संसार में निमग्न रहता है। मिथ्या अहंकार में डूबा हुआ वह सोचता है कि हर कार्य वह स्वयं कर रहा है। भगवान् की बहिरंगा शक्ति अर्थात् भौतिक प्रकृति पूरी तरह से परमेश्वर के अधीन है और बद्धात्मा बहिरंगा शक्ति के पूर्ण नियंत्रण में होता है। अत: बद्धजीव पूर्णत: भगवान् के नियमों के अधीन होता है। किन्तु केवल मायावश वह अपने को अपने कर्मों में स्वतंत्र मानता है। दुर्योधन बहिरंगा प्रकृति के ऐसे प्रभाव के अन्तर्गत कार्य कर रहा था जिसके फलस्वरूप अन्त में उसका सफाया हो जाएगा। उसने विदुर के परामर्श को नहीं माना, उल्टे उन महात्मा को अपमानित किया, जो उसके सारे परिवार के हितैषी थे। विदुर इसे समझते थे, क्योंकि वे भगवान् के शुद्ध भक्त थे। दुर्योधन के वचनों से बुरी तरह अपमानित होने पर भी विदुर यह देख सके कि दुर्योधन माया (बहिरंगा शक्ति) के वश में होने से अपने ही विनाश के पथ पर अग्रसर हो रहा है। अतएव उन्होंने बहिरंगा शक्ति के कार्यों को सर्वोपरि माना; तथापि उन्होंने यह भी देखा कि भगवान् की अन्तरंगा शक्ति उस विशिष्ट स्थिति में किस तरह उनकी सहायता कर रही थी। भक्त सदैव विरक्त भाव से रहता है, क्योंकि सांसारिक आकर्षण उसको कभी तुष्ट नहीं कर पाते। विदुर कभी भी अपने भाई के राजमहल द्वारा आकृष्ट नहीं थे। वे सदैव उस राजमहल को त्याग कर भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में अपने को पूरी तरह लगाने के लिए तैयार रहते थे। अब दुर्योधन की कृपा से उन्हें अवसर मिला था। अत: अपमान के कटु वचनों से दुखी होने की बजाय उन्होंने मन ही मन उसे धन्यवाद दिया, क्योंकि उसके कारण उन्हें पवित्र स्थान में अकेले रहने और भगवद्भक्ति में लगे रहने का अवसर प्राप्त हुआ। गत-व्यथ: शब्द (बिना दुखी हुए) यहाँ पर महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि विदुर उन यातनाओं से मुक्त हो गये जिनसे भौतिक कार्यों में बँधा हुआ प्रत्येक व्यक्ति पीडि़त होता रहता है। अतएव उन्होंने सोचा कि धनुष के द्वारा अपने भाई की रक्षा करने की कोई आवश्यकता नहीं रही, क्योंकि उसके भाई का विनाश तो निश्चित ही है। इसलिए इसके पूर्व कि दुर्योधन कोई कार्यवाही करे उन्होंने महल छोड़ दिया। यहाँ पर भगवान् की परम शक्ति माया ने अंदर से तथा बाहर से दोनों प्रकार से कार्य किया।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥