श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 1: विदुर द्वारा पूछे गये प्रश्न  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
स निर्गत: कौरवपुण्यलब्धो
गजाह्वयात्तीर्थपद: पदानि ।
अन्वाक्रमत्पुण्यचिकीर्षयोर्व्यां
अधिष्ठितो यानि सहस्रमूर्ति: ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह (विदुर); निर्गत:—छोडऩे के बाद; कौरव—कुरु वंश; पुण्य—पुण्य; लब्ध:—प्राप्त किया हुआ; गज-आह्वयात्— हस्तिनापुर से; तीर्थ-पद:—भगवान् की; पदानि—तीर्थयात्राओं की; अन्वाक्रमत्—शरण ली; पुण्य—पुण्य; चिकीर्षया—ऐसी इच्छा करते हुए; उर्व्याम्—उच्चकोटि की; अधिष्ठित:—स्थित; यानि—वे सभी; सहस्र—हजारों; मूर्ति:—स्वरूप ।.
 
अनुवाद
 
 अपने पुण्य के द्वारा विदुर ने पुण्यात्मा कौरवों के सारे लाभ प्राप्त किये। उन्होंने हस्तिनापुर छोडऩे के बाद अनेक तीर्थस्थानों की शरण ग्रहण की जो कि भगवान् के चरणकमल हैं। उच्चकोटि का पवित्र जीवन पाने की इच्छा से उन्होंने उन पवित्र स्थानों की यात्रा की जहाँ भगवान् के हजारों दिव्य रूप स्थित हैं।
 
तात्पर्य
 विदुर निस्सन्देह अति उच्चोकिट के पुण्यात्मा थे, अन्यथा वे कौरव वंश में उत्पन्न न हुए होते। उच्च कुल पाना ऐश्वर्यमय होना, उच्च विद्वान होना और शरीर से अति सुन्दर होना—ये सब विगत पुण्यकर्मों के फलस्वरूप मिलते हैं। किन्तु भगवान् की कृपा पाने तथा उनकी दिव्य प्रेमाभक्ति में लगे रहने के लिए ऐसी पवित्र वस्तुएँ ही पर्याप्त नहीं हैं। विदुर अपने आपको कम पवित्र मानते थे, अतएव उन्होंने अधिक पुण्य प्राप्त करने तथा भगवान् के निकट पहुँचने के लिए संसार के सभी महान् तीर्थ स्थानों की यात्रा करने का निश्चय किया। उस समय यद्यपि भगवान् कृष्ण सदेह इस जगत में उपस्थित थे और विदुर तत्काल सीधे उनके पास पहुँच सकते थे, किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वे पापों से पूरी तरह मुक्त नहीं हुए थे। जब तक पाप के प्रभावों से पूरी तरह मुक्त न हो लिया जाय तब तक कोई मनुष्य भगवान् के प्रति शत प्रतिशत अनुरक्त नहीं हो सकता। विदुर को इसका भान था कि कूटनीतिज्ञ धृतराष्ट्र तथा दुर्योधन की संगति के कारण उनका पुण्य समाप्त हो चुका है, अतएव वे तुरन्त ही भगवान् की संगति करने के योग्य नहीं हैं। भगवद्गीता (७.२८) में इसकी पुष्टि निम्नलिखित श्लोक में हुई है—

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।

ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रता: ॥

कंस तथा जरासन्ध जैसे पापी असुर व्यक्ति सोच ही नहीं सकते कि कृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अर्थात् परम सत्य हैं। केवल वे, जो शुद्ध भक्त हैं, जो शास्त्रों में निर्दिष्ट धार्मिक जीवन के नियामक सिद्धान्तों का पालन करते हैं, अपने को कर्मयोग में, तत्पश्चात् ज्ञानयोग में लगा पाते हैं और उसके बाद शुद्ध ध्यान द्वारा विशुद्ध चेतना को समझ सकते हैं। ईशचेतना (भावनामृत) उत्पन्न होने पर मनुष्य शुद्ध भक्तों की संगति का लाभ उठा सकता है। स्यान् महत्सेवया विप्रा: पुण्यतीर्थनिषेवणात्—इसी जीवन काल में भगवान् की संगति की जा सकती है।

तीर्थ स्थान तीर्थयात्रियों के पापों का निवारण करने के निमित्त होते हैं और शुद्ध जीवन तथा ईश साक्षात्कार प्राप्त करने वालों की सुविधा के लिए ये तीर्थस्थान ब्रह्माण्ड भर में फैल हुए हैं। किन्तु मनुष्य को केवल तीर्थस्थानों में जाने तथा अपने नियत कर्मों को करने से ही तुष्ट नहीं हो जाना चाहिए।

उसे उन महात्माओं से मिलने के लिए उत्सुक रहना चाहिए जो पहले से वहाँ भगवान् की सेवा में लगे हुए हैं, प्रत्येक तीर्थस्थान में भगवान् अपने विविध दिव्य स्वरूपों में वर्तमान रहते हैं। ये स्वरूप अर्चामूर्ति कहलाते हैं—अर्थात् भगवान् के वे रूप जिन्हें सामान्य व्यक्ति आसानी से समझ सकता है। भगवान् हमारी सांसारिक इन्द्रियों के लिए अगम्य हैं। वे हमारी वर्तमान आँखों से देखे नहीं जा सकते हैं, न ही वे हमारे वर्तमान कानों से सुने जा सकते हैं। हम उस मात्रा में जितना कि हम भगवत्सेवा में प्रविष्ट हो चुके हैं या उस अनुपात में जितना हमारे जीवन पापों से मुक्त हुए रहते हैं, भगवान् का अनुभव कर सकते हैं। किन्तु यद्यपि हम पापों से मुक्त नहीं होते, भगवान् इतने कृपालु हैं कि वे मन्दिर में अपनी अर्चामूर्तियों के रूप में हमें अपना दर्शन देने की सुविधा प्रदान करते हैं। ईश्वर सर्वशक्तिमान हैं, अतएव वे अपना अर्चा रूप प्रस्तुत करके हमारी सेवाएँ स्वीकार कर सकते हैं। इसलिए किसी को यह सोचने की मूर्खता नहीं करनी चाहिए कि मन्दिर का अर्चारूप एक मूर्ति है। ऐसी अर्चामूर्ति मूर्ति नहीं, अपितु स्वयं भगवान् होती है और जो जिस अनुपात में पापों से मुक्त हुआ होता है, उसी के अनुसार वह अर्चामूर्ति के महत्त्व को समझ सकता है। अतएव मार्गदर्शन पाने के लिए किसी शुद्ध भक्त की आवश्यकता सदैव बनी रहती है।

भारतवर्ष में देश भर में लाखों तीर्थस्थल फैले हुए हैं और परम्परानुसार सामान्य व्यक्ति वर्ष की सारी ऋतुओं में इन पवित्र स्थानों की यात्रा करता है। विभिन्न तीर्थस्थानों में स्थित कतिपय अर्चा स्वरूपों का उल्लेख इस प्रकार है : वे मथुरा में (कृष्ण का जन्मस्थान) आदिकेशव रूप में, पुरी (उड़ीसा) में भगवान् जगन्नाथ (पुरुषोत्तम भी) के रूप में, इलाहाबाद (प्रयाग) में बिन्दु-माधव के रूप में, मन्दराचल में मधुसूदन रूप में, आनन्दारण्य में वासुदेव, पद्मनाभ, तथा जनार्दन रूप में, विष्णुकाञ्ची में विष्णु रूप में तथा मायापुर में हरि रूप में विराजमान हैं। ब्रह्माण्ड भर में भगवान् की ऐसी करोड़ों अर्चामूर्तियाँ हैं। इन समस्त अर्चामूर्तियों का सारांश चैतन्य-चरितामृत में इस प्रकार दिया हुआ है—

सर्वत्र प्रकाश ताँर—भक्ते सुख दिते।

जगतेर अधर्म नाशि’ धर्म स्थापिते ॥

“भगवान् ने अपने को ब्रह्माण्ड भर में इस तरह फैला रखा है, जिससे भक्तों को आनन्द मिले, सामान्य जनों को अपने पापों से निवारण करने की सुविधा प्राप्त हो तथा संसार में धर्म की स्थापना की जा सके।”

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥