श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 1: विदुर द्वारा पूछे गये प्रश्न  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक
पुरेषु पुण्योपवनाद्रिकुञ्जे-
ष्वपङ्कतोयेषु सरित्सर:सु ।
अनन्तलिङ्गै: समलङ्कृतेषु
चचार तीर्थायतनेष्वनन्य: ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
पुरेषु—अयोध्या, द्वारका तथा मथुरा जैसे स्थानों में; पुण्य—पुण्य; उप-वन—वायु; अद्रि—पर्वत; कुञ्जेषु—बगीचों में; अपङ्क—पापरहित; तोयेषु—जल में; सरित्—नदी; सर:सु—झीलों में; अनन्त-लिङ्गै:—अनन्त के रूपों; समलङ्कृतेषु—इस तरह से अलंकृत किये गये; चचार—सम्पन्न किया; तीर्थ—तीर्थस्थान; आयतनेषु—पवित्र भूमि; अनन्य:—एकमात्र या केवल कृष्ण का दर्शन करना ।.
 
अनुवाद
 
 वे एकमात्र कृष्ण का चिन्तन करते हुए अकेले ही विविध पवित्र स्थानों यथा अयोध्या, द्वारका तथा मथुरा से होते हुए यात्रा करने निकल पड़े। उन्होंने ऐसे स्थानों की यात्रा की जहाँ की वायु, पर्वत, बगीचे, नदियाँ तथा झीलें शुद्ध तथा निष्पाप थीं और जहाँ अनन्त के विग्रह मन्दिरों की शोभा बढ़ाते हैं। इस तरह उन्होंने तीर्थयात्रा की प्रगति सम्पन्न की।
 
तात्पर्य
 भगवान् के अर्चारूपों को नास्तिक जन मूर्तियाँ मान सकते हैं, किन्तु विदुर या उनके अन्य अनेक सेवक ऐसा नहीं मानते। भगवान् के स्वरूपों का उल्लेख यहाँ पर अनन्त लिंग के रूप में हुआ है। भगवान् के ऐसे रूपों में असीम शक्ति होती है, जो स्वयं भगवान् जैसी ही होती है। अर्चा की शक्तियों तथा भगवान् के साकार रूपों की शक्तियों में कोई अन्तर नहीं होता। यहाँ पर पत्रपेटी (पोस्ट बाक्स) तथा डाकघर (पोस्ट आफिस) का उदाहरण लागू होता है। शहर भर में लगी छोटी छोटी पत्रपेटियों में सार्वजनिक डाक व्यवस्था के समान ही शक्ति होती है। डाकघर का कार्य पत्रों का एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाना है। यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक डाकघर द्वारा मान्य पत्रपेटियों में पत्र डालता है, तो पत्र ले जाने का कार्य निश्चित रूप से सम्पन्न होता है। इसी तरह अर्चामूर्ति भगवान् के साक्षात् उपस्थित होने जैसी असीम शक्ति प्रदान कर सकती है। इसलिए विदुर को विविध अर्चारूपों में कृष्ण के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दिखा और अन्तत: वे एकमात्र कृष्ण का साक्षात्कार कर सके, अन्य किसी का नहीं।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥