श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 1: विदुर द्वारा पूछे गये प्रश्न  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
गां पर्यटन्मेध्यविविक्तवृत्ति:
सदाप्लुतोऽध:शयनोऽवधूत: ।
अलक्षित: स्वैरवधूतवेषो
व्रतानि चेरे हरितोषणानि ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
गाम्—पृथ्वी पर; पर्यटन्—भ्रमण करते; मेध्य—शुद्ध; विविक्त-वृत्ति:—जीने के लिए स्वतंत्र पेशा; सदा—सदैव; आप्लुत:— पवित्र किया गया; अध:—पृथ्वी पर; शयन:—लेटे हुए; अवधूत:—(बाल, नाखून इत्यादि) बिना सँवारे या कटे.); अलक्षित:—किसी के द्वारा बिना देखे हुए; स्वै:—अकेले; अवधूत-वेष:—साधू की तरह वेश धारण किये; व्रतानि—व्रत; चेरे—सम्पन्न किया; हरि-तोषणानि—भगवान् को प्रसन्न करने वाले ।.
 
अनुवाद
 
 इस तरह पृथ्वी का भ्रमण करते हुए उन्होंने भगवान् हरि को प्रसन्न करने के लिए कृतकार्य किये। उनकी वृत्ति शुद्ध एवं स्वतंत्र थी। वे पवित्र स्थानों में स्नान करके निरन्तर शुद्ध होते रहे, यद्यपि वे अवधूत वेश में थे—न तो उनके बाल सँवरे हुए थे न ही लेटने के लिए उनके पास बिस्तर था। इस तरह वे अपने तमाम परिजनों से अलक्षित रहे।
 
तात्पर्य
 तीर्थयात्री का सर्वप्रमुख कर्तव्य (कृतकार्य) भगवान् हरि को प्रसन्न करना है। तीर्थयात्रा करते समय उसे समाज की प्रसन्नता की चिन्ता नहीं करनी चाहिए। उसे सामाजिक औपचारिकताओं या वृत्ति या वेश पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं रहती। उसे सदा भगवान् को प्रसन्न करने वाले कार्य में लीन रहना चाहिए। इस तरह विचार तथा कर्म से शुद्ध हुआ तीर्थयात्री तीर्थ यात्रा की विधि से परमेश्वर का साक्षात्कार कर सकता है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥