श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 1: विदुर द्वारा पूछे गये प्रश्न  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक
अन्यानि चेह द्विजदेवदेवै:
कृतानि नानायतनानि विष्णो: ।
प्रत्यङ्गमुख्याङ्कितमन्दिराणि
यद्दर्शनात्कृष्णमनुस्मरन्ति ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
अन्यानि—अन्य; च—तथा; इह—यहाँ; द्विज-देव—महर्षियों द्वारा; देवै:—तथा देवताओं द्वारा; कृतानि—स्थापित; नाना— विविध; आयतनानि—विविध रूप; विष्णो:—भगवान् के; प्रति—प्रत्येक; अङ्ग—अंग; मुख्य—प्रमुख; अङ्कित—चिन्हित; मन्दिराणि—मन्दिर; यत्—जिनके; दर्शनात्—दूर से देखने से; कृष्णम्—आदि भगवान् को; अनुस्मरन्ति—निरन्तर स्मरण कराते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 वहाँ महर्षियों तथा देवताओं द्वारा स्थापित किये गये पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु के विविध रूपों से युक्त अनेक अन्य मन्दिर भी थे। ये मन्दिर भगवान् के प्रमुख प्रतीकों से अंकित थे और आदि भगवान् श्रीकृष्ण का सदैव स्मरण कराने वाले थे।
 
तात्पर्य
 मानव समाज चार सामाजिक वर्णों तथा चार आध्यात्मिक प्रयागों में विभाजित है, जो प्रत्येक मनुष्य पर लागू होता है। यह प्रणाली वर्णाश्रम धर्म कहलाती है और इस महान् ग्रन्थ में अनेक स्थलों पर इसकी व्याख्या की जा चुकी है। साधु सन्त या वे व्यक्ति जो सम्पूर्ण मानव समाज के आध्यात्मिक उत्थान में पूर्णत: लगे रहते थे द्विज देव कहलाते थे, अर्थात् द्विजों में सर्वश्रेष्ठ। चन्द्रलोक से ऊपर के उत्कृष्ट लोकों के वासी देव कहलाते थे। द्विजदेव तथा देव दोनों ही विष्णु के विविध स्वरूपों वाले, यथा गोविन्द, मधुसूदन, नृसिंह, माधव, केशव, नारायण, पद्मनाभ, पार्थसारथी आदि नामों वाले मन्दिरों की स्थापना करते हैं। भगवान् असंख्य रूपों में अपना विस्तार करते हैं, किन्तु वे सभी रूप एक दूसरे से अभिन्न होते हैं। भगवान् विष्णु के चार हाथ रहते हैं और प्रत्येक हाथ में विशेष वस्तु—यथा शंख, चक्र, गदा या कमल का फूल रहता है। इन चार चिह्नों में से चक्र प्रमुख है; आदि विष्णु रूप होने से कृष्ण के एक ही चिह्न, चक्र, होता है, इसीलिए कभी-कभी उनको चक्री भी कहा जाता है। भगवान् का चक्र शक्ति का प्रतीक है, जिससे वे सारे जगत का नियंत्रण करते हैं। विष्णु मन्दिरों के शिखरों पर चक्र का प्रतीक रहता है, जिससे लोग दूर से इस प्रतीक को देख सकें और तुरन्त भगवान् कृष्ण का स्मरण कर सकें। अत्यन्त ऊँचे मन्दिरों के निर्माण का उद्देश्य लोगों को दूर से दर्शन करने का सुयोग प्रदान करना है। भारत में जब भी कोई नया मन्दिर बनाया जाता है, तो यही शैली अपनायी जाती है और ऐसा प्रतीत होता है कि लिखित इतिहास के पहले से ही यह शैली चली आ रही है। नास्तिकों द्वारा किये जाने वाले इस मूर्खतापूर्ण प्रचार का कि मन्दिरों का निर्माण बाद में हुआ, यहाँ पर खण्डन हो जाता है, क्योंकि कम से कम पाँच हजार वर्ष पूर्व विदुर ने इन मन्दिरों को देखा था और विष्णु के ये मन्दिर विदुर द्वारा देखे जाने के बहुत पहले से विद्यमान थे। महर्षियों तथा देवताओं ने कभी भी मनुष्यों या देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित नहीं कीं, किन्तु सामान्य लोगों के लाभार्थ, उन्हें ईशभावनामृत के स्तर तक उठाने के लिए, उन्होंने विष्णु मन्दिरों की स्थापना की।
 
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