श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 1: विदुर द्वारा पूछे गये प्रश्न  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक
कच्चित्सुखं सात्वतवृष्णिभोज-
दाशार्हकाणामधिप: स आस्ते ।
यमभ्यषिञ्चच्छतपत्रनेत्रो
नृपासनाशां परिहृत्य दूरात् ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
कच्चित्—क्या; सुखम्—सब कुशल मंगल है; सात्वत—सात्वत जाति; वृष्णि—वृष्णि वंश; भोज—भोज वंश; दाशार्हकाणाम्—दाशार्ह जाति; अधिप:—राजा उग्रसेन; स:—वह; आस्ते—है; यम्—जिसको; अभ्यषिञ्चत्—प्रतिष्ठित; शत पत्र-नेत्र:—श्रीकृष्ण ने; नृप-आसन-आशाम्—राजसिंहासन की आशा; परिहृत्य—त्याग कर; दूरात्—दूरस्थान पर ।.
 
अनुवाद
 
 हे मित्र, (मुझे बताओ) क्या सात्वतों, वृष्णियों, भोजों तथा दाशार्हों के राजा उग्रसेन अब कुशल-मंगल तो हैं? वे अपने राजसिंहासन की सारी आशाएँ त्यागकर अपने साम्राज्य से दूर चले गये थे, किन्तु भगवान् कृष्ण ने पुन: उन्हें प्रतिष्ठित किया।
 
 
शेयर करें
       
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥