श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 1: विदुर द्वारा पूछे गये प्रश्न  »  श्लोक 30

 
श्लोक
कच्चिद्धरे: सौम्य सुत: सद‍ृक्ष
आस्तेऽग्रणी रथिनां साधु साम्ब: ।
असूत यं जाम्बवती व्रताढ्या
देवं गुहं योऽम्बिकया धृतोऽग्रे ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
कच्चित्—क्या; हरे:—भगवान् का; सौम्य—हे गम्भीर; सुत:—पुत्र; सदृक्ष:—समान; आस्ते—ठीक से रह रहा है; अग्रणी:— अग्रगण्य; रथिनाम्—योद्धाओं के; साधु—अच्छे आचरण वाला; साम्ब:—साम्ब; असूत—जन्म दिया; यम्—जिसको; जाम्बवती—कृष्ण की पत्नी जाम्बवती ने; व्रताढ्या—व्रतों से सम्पन्न; देवम्—देवता; गुहम्—कार्तिकेय नामक; य:—जिसको; अम्बिकया—शिव की पत्नी से; धृत:—उत्पन्न; अग्रे—पूर्व जन्म में ।.
 
अनुवाद
 
 हे भद्रपुरुष, साम्ब ठीक से तो है? वह भगवान् के पुत्र सदृश ही है। पूर्वजन्म में वह शिव की पत्नी के गर्भ से कार्तिकेय के रूप में जन्मा था और अब वही कृष्ण की अत्यन्त सौभाग्यशालिनी पत्नी जाम्बवती के गर्भ से उत्पन्न हुआ है।
 
तात्पर्य
 भगवान् के तीन गुणावतारों में शिव भगवान् के स्वांश हैं। उनसे उत्पन्न कार्तिकेय भगवान् कृष्ण के अन्य पुत्र प्रद्युम्न के ही समकक्ष है। जब भगवान् कृष्ण भौतिक जगत में अवतरित होते हैं, तो उनके सभी स्वांश भी उनके साथ उनके विभिन्न कार्यों को प्रकट करने हेतु उत्पन्न होते हैं। किन्तु वृन्दावन की लीलाओं के अतिरिक्त भगवान् के सारे कार्य उनके विभिन्न स्वांशों द्वारा सम्पन्न किये जाते हैं। वासुदेव नारायण के स्वांश हैं, अत: जब भगवान्
देवकी तथा वसुदेव के समक्ष वासुदेव रूप में प्रकट हुए तो वे अपने नारायण के रूप में ही प्रकट हुए। इसी तरह स्वर्ग के सारे देवता प्रद्युम्न, साम्ब, उद्धव इत्यादि भगवान् के संगियों के रूप में प्रकट हुए। इस श्लोक से यह समझा जा सकता है कि कामदेव प्रद्युम्न के रूप में, कार्तिकेय साम्ब के रूप में और वसुओं में से एक वसु उद्धव के रूप में प्रकट हुए। इन सबों ने भगवान् की लीलाओं को सम्वर्धित करने के लिए विभिन्न पदों पर रहकर सेवा की।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥