श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 1: विदुर द्वारा पूछे गये प्रश्न  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक
कच्चिद् बुध: स्वस्त्यनमीव आस्ते
श्वफल्कपुत्रो भगवत्प्रपन्न: ।
य: कृष्णपादाङ्कितमार्गपांसु-
ष्वचेष्टत प्रेमविभिन्नधैर्य: ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
कच्चित्—क्या; बुध:—अत्यन्त विद्वान; स्वस्ति—ठीक से; अनमीव:—त्रुटिरहित; आस्ते—है; श्वफल्क-पुत्र:—श्वफल्क का पुत्र अक्रूर; भगवत्—भगवान् के; प्रपन्न:—शरणागत; य:—वह जो; कृष्ण—भगवान् श्रीकृष्ण; पाद-अङ्कित—चरणचिह्नों से शोभित; मार्ग—रास्ता; पांसुषु—धूल में; अचेष्टत—प्रकट किया; प्रेम-विभिन्न—दिव्य प्रेम में निमग्न; धैर्य:—मानसिक संतुलन ।.
 
अनुवाद
 
 कृपया मुझे बताएँ कि श्वफल्क पुत्र अक्रूर ठीक से तो है? वह भगवान् का शरणागत एक दोषरहित आत्मा है। उसने एक बार दिव्य प्रेम-भाव में अपना मानसिक सन्तुलन खो दिया था और उस मार्ग की धूल में गिर पड़ा था जिसमें भगवान् कृष्ण के पदचिन्ह अंकित थे।
 
तात्पर्य
 जब अक्रूर कृष्ण की खोज में वृन्दावन आये तो उन्होंने नन्दग्राम की धूलि में भगवान् के चरणचिह्न देखे और वे भावावेश में तुरन्त ही उन पर गिर पड़े। यह भाव उसी भक्त में सम्भव है, जो कृष्ण के सतत विचारों में पूर्णतया निमग्न हो। भगवान् का ऐसा शुद्ध भक्त स्वभावत: दोष रहित होता है, क्योंकि वह परम रुप से शुद्ध भगवान् से सदैव सम्बद्ध रहता है। भगवान् का निरन्तर ध्यान करना भौतिक गुणों के दूषण से अपने को मुक्त रखने की प्रतिसंदूषण विधि है। भगवान् का शुद्ध भक्त भगवान् के विषय में सोचते रहने के कारण सदैव उनकी संगति में रहता है। तो भी देश तथा काल के विशेष सन्दर्भ में दिव्य भावानाएँ विभिन्न मोड़ लेती हैं और इससे भक्त का मानसिक सन्तुलन डगमगा जाता है। भगवान् चैतन्य ने दिव्य भाव का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत किया जैसाकि ईश्वर के इस अवतार के जीवन से हम समझ पाते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥