श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 1: विदुर द्वारा पूछे गये प्रश्न  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक
किं वा कृताघेष्वघमत्यमर्षी
भीमोऽहिवद्दीर्घतमं व्यमुञ्चत् ।
यस्याङ्‌घ्रि पातं रणभूर्न सेहे
मार्गं गदायाश्चरतो विचित्रम् ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
किम्—क्या; वा—अथवा; कृत—सम्पन्न; अघेषु—पापियों के प्रति; अघम्—क्रुद्ध; अति-अमर्षी—अजेय; भीम:—भीम; अहि-वत्—काले सर्प की भाँति; दीर्घ-तमम्—दीर्घ काल से; व्यमुञ्चत्—विमुक्त किया; यस्य—जिसका; अङ्घ्रि-पातम्— पदचाप; रण-भू:—युद्ध भूमि; न—नहीं; सेहे—सह सका; मार्गम्—मार्ग; गदाया:—गदाओं द्वारा; चरत:—चलाते हुए; विचित्रम्—विचित्र ।.
 
अनुवाद
 
 [कृपया मुझे बताएँ] क्या विषैले सर्प तुल्य एवं अजेय भीम ने पापियों पर अपना दीर्घकालीन क्रोध बाहर निकाल दिया है? गदा-चालन के उसके कौशल को रण-भूमि भी सहन नहीं कर सकती थी, जब वह उस पथ पर चल पड़ता था।
 
तात्पर्य
 भीम के बल से विदुर परिचित थे। जब भी भीम युद्धक्षेत्र में होता तो पथ पर उसकी पदचाप तथा उसके अद्भुत गदा-कौशल शत्रु के लिए असह्य होते। बलशाली भीम ने लम्बे समय तक धृतराष्ट्र के पुत्रों के विरुद्ध कोई कदम नहीं उठाया। विदुर की जिज्ञासा थी कि क्या उसने अभी तक सताये हुए विषैले सर्प की भाँति अपना क्रोध बाहर निकाला है? जब सर्प लम्बेसमय से पनप रहे क्रोध के पश्चात् अपना विष छोड़ता है, तो शिकार जीवित नहीं रह सकता।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥