श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 1: विदुर द्वारा पूछे गये प्रश्न  »  श्लोक 41

 
श्लोक
सौम्यानुशोचे तमध:पतन्तं
भ्रात्रे परेताय विदुद्रुहे य: ।
निर्यापितो येन सुहृत्स्वपुर्या
अहं स्वपुत्रान् समनुव्रतेन ॥ ४१ ॥
 
शब्दार्थ
सौम्य—हे भद्रपुरुष; अनुशोचे—शोक करता हूँ; तम्—उसको; अध:-पतन्तम्—नीचे गिरते हुए; भ्रात्रे—अपने भाई पर; परेताय—मृत्यु; विदुद्रुहे—विद्रोह किया; य:—जिसने; निर्यापित:—भगा दिया गया; येन—जिसके द्वारा; सुहृत्—शुभैषी; स्व पुर्या:—अपने ही घर से; अहम्—मैं; स्व-पुत्रान्—अपने पुत्रों समेत; समनु-व्रतेन—वैसी ही कार्यवाही को स्वीकार करते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 हे भद्रपुरुष, मैं तो एकमात्र उस (धृतराष्ट्र) के लिए शोक कर रहा हूँ जिसने अपने भाई की मृत्यु के बाद उसके प्रति विद्रोह किया। उसका निष्ठावान हितैषी होते हुए भी उसके द्वारा मैं अपने घर से निकाल दिया गया, क्योंकि उसने भी अपने पुत्रों के द्वारा अपनाए गये मार्ग का ही अनुसरण किया था।
 
तात्पर्य
 विदुर ने अपने जेष्ठ भ्राता की कुशलता के बारे में नहीं पूछा, क्योंकि उसके कल्याण का कोई अवसर नहीं था, उसके अध:पतित होने का ही समाचार हो सकता था। विदुर धृतराष्ट्र के निष्ठावान हितैषी थे और उनके मन के भीतर उसके विषय में एक विचार था। उन्होंने शोक व्यक्त किया कि धृतराष्ट्र ने अपने मृत भ्राता पाण्डु के पुत्रों के विरुद्ध विद्रोह कर सकता था और यह
की उसने अपने कुटिल पुत्रों के आदेश पर उन्हें ही (विदुर को) उनके घर से निकाल दिया। इन कार्यों के बावजूद विदुर कभी भी धृतराष्ट्र के शत्रु नहीं बने, प्रत्युत उसके हितैषी बने रहे, यहाँ तक कि धृतराष्ट्र के अन्तिम दिनों में विदुर ही उसके एकमात्र असली मित्र सिद्ध हुए। विदुर जैसे वैष्णव का आचरण ही ऐसा होता है—वह अपने शत्रुओं का भी भला सोचता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥