श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 1: विदुर द्वारा पूछे गये प्रश्न  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक
अजस्य जन्मोत्पथनाशनाय
कर्माण्यकर्तुर्ग्रहणाय पुंसाम् ।
नन्वन्यथा कोऽर्हति देहयोगं
परो गुणानामुत कर्मतन्त्रम् ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
अजस्य—अजन्मा का; जन्म—प्राकट्य; उत्पथ-नाशनाय—दुष्टों का विनाश करने के लिए; कर्माणि—कार्य; अकर्तु:—निठल्ले का; ग्रहणाय—ग्रहण करने के लिए; पुंसाम्—सारे व्यक्तियों का; ननु अन्यथा—नहीं तो; क:—कौन; अर्हति—योग्य हो सकता है; देह-योगम्—शरीर का सम्पर्क; पर:—दिव्य; गुणानाम्—तीन गुणों का; उत—क्या कहा जा सकता है; कर्म तन्त्रम्—कार्य-कारण का नियम ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् का प्राकट्य दुष्टों का संहार करने के लिए होता है। उनके कार्य दिव्य होते हैं और समस्त व्यक्तियों के समझने के लिए ही किये जाते हैं। अन्यथा, समस्त भौतिक गुणों से परे रहने वाले भगवान् का इस पृथ्वी में आने का क्या प्रयोजन हो सकता है?
 
तात्पर्य
 ईश्वर: परम: कृष्ण: सच्चिदानन्द विग्रह: (ब्रह्म-संहिता ५.१)—भगवान् का स्वरूप नित्य, आनन्दमय तथा सर्वज्ञ है। अतएव उनका तथाकथित जन्म एक तरह से केवल प्राकट्य होता है, जिस तरह क्षितिज से सूर्य का उत्पन्न होना है। उनका जन्म जीवों जैसा प्रकृति के प्रभाव तथा विगत कर्मों के फलों के बन्धन के अन्तर्गत नहीं होता। उनके कार्य एवं गतिविधियाँ स्वतंत्र लीलाएँ हैं और भौतिक प्रकृति के कर्मफलों के अधीन नहीं हैं। भगवद्गीता (४.१४) में कहा गया है—

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।

इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥

जीवों के लिए भगवान् द्वारा बनाया गया कर्म का नियम स्वंय भगवान् पर लागू नहीं होता, न ही वे सामान्य जीवों की तरह कर्मों के द्वारा अपने को सुधारने के लिए इच्छुक रहते हैं। साधारण जीव अपने बद्ध जीवन को सुधारने के लिए कर्म करते हैं, किन्तु भगवान् पहले से समस्त ऐश्वर्य, समस्त बल, समस्त यश, समस्त सौन्दर्य, समस्त ज्ञान तथा समस्त त्याग से परिपूर्ण हैं। तो फिर वे सुधार के लिए इच्छा क्यों करें? कोई व्यक्ति किसी भी ऐश्वर्य में उनसे आगे नहीं जा सकता, अतएव सुधार की इच्छा उनके लिए सर्वथा निरर्थक है। मनुष्य को सदैव भगवान् तथा सामान्य जीवों के कार्यकलापों में अन्तर करना चाहिए। तभी वह भगवान् के दिव्य पद के विषय में सही निर्णय पर पहुँच सकता है। जो भगवान् की दिव्यता के विषय में किसी निर्णय पर पहुँच जाता है, वह भगवान् का भक्त बन सकता है और अपने विगत कर्मों के समस्त फलों से तुरन्त मुक्त हो सकता है। कहा गया है कर्माणि निर्दहति किन्तु च भक्तिभाजाम्; भगवान् भक्त के विगत कर्मों के फलों को या तो कम कर देते हैं या एकदम निष्प्रभावित कर देते हैं (ब्रह्म-संहिता ५.५४) भगवान् के कार्यकलाप सभी जीवों द्वारा अपनाए जाने तथा आस्वाद किये जाने के लिए हैं। उनके कार्यकलाप सामान्य व्यक्ति को भगवान् के प्रति आकृष्ट करने के लिए होते हैं। भगवान् सदैव भक्तों के हित में कार्य करते हैं, अतएव सामान्य व्यक्ति, जो कि सकामकर्मी होते हैं या मोक्षकामी होते हैं, भगवान् के प्रति आकृष्ट हो सकते हैं जब वे भक्तों के रक्षक के रूप में कार्य करते हैं। सकाम कर्मी भक्ति-मय सेवा द्वारा अपने लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं और मोक्षकामी भी भगवद्भक्ति द्वारा अपना जीवन लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। भक्तगण न तो अपने कर्म का फल चाहते हैं न ही वे किसी प्रकार का मोक्ष चाहते हैं। वे तो भगवान् के यशस्वी अतिमानवीय कार्यों का, यथा उनके द्वारा गोवर्धन पर्वत के उठाये जाने तथा बाल्यावस्था में ही पूतना राक्षसी का वध किये जाने का, आस्वादन करते हैं। उनके कार्य सभी प्रकार के लोगों—कर्मियों, ज्ञानियों तथा भक्तों—को आकृष्ट करने के लिए सम्पन्न किये जाते हैं। चूँकि वे कर्म के समस्त नियमों से परे हैं, अतएव उनके लिए माया के रूप को स्वीकार करने की सम्भावना नहीं रहती, जिस प्रकार अपने कर्मों के फलों से बद्ध सामान्य जीव बाध्य हो जाते हैं।

उनके प्राकट्य का गौण प्रयोजन दुष्ट असुरों का संहार करने तथा अल्पज्ञों द्वारा अनर्गल नास्तिकतावादी प्रचार को रोकना है। भगवान् की अहैतुकी कृपा से भगवान् द्वारा मारे जाने वाले असुरों को मोक्ष प्राप्त होता है। भगवान् का सार्थक प्राकट्य सामान्य जन्म से सदैव भिन्न होता है। यहाँ तक कि शुद्ध भक्तों का भी भौतिक देह से कोई सम्बन्ध नहीं होता और सच्चिदानन्द रूप में प्रकट होने वाले भगवान् निश्चित रूप से भौतिक स्वरूप द्वारा परि-सीमित नहीं होते।

 
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