श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 10: सृष्टि के विभाग  »  श्लोक 12

 
श्लोक
विश्वं वै ब्रह्मतन्मात्रं संस्थितं विष्णुमायया ।
ईश्वरेण परिच्छिन्नं कालेनाव्यक्तमूर्तिना ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
विश्वम्—भौतिक चक्र; वै—निश्चय ही; ब्रह्म—ब्रह्म; तत्-मात्रम्—उसी तरह का; संस्थितम्—स्थित; विष्णु-मायया—विष्णु की शक्ति से; ईश्वरेण—भगवान् द्वारा; परिच्छिन्नम्—पृथक् की गई; कालेन—नित्य काल द्वारा; अव्यक्त—अप्रकट; मूर्तिना— ऐसे स्वरूप द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 यह विराट जगत भौतिक शक्ति के रूप में अप्रकट तथा भगवान् के निर्विशेष स्वरूप काल द्वारा भगवान् से विलग किया हुआ है। यह विष्णु की उसी भौतिक शक्ति के प्रभाव के अधीन भगवान् की वस्तुगत अभिव्यक्ति के रूप में स्थित है।
 
तात्पर्य
 जैसाकि व्यासदेव के समक्ष नारद पहले कह चुके हैं (भागवत १.५.२०) इदं हि विश्वं भगवान् इवेतर:—यह अव्यक्त जगत साक्षात् भगवान् है, किन्तु यह भगवान् से परे या भिन्न कुछ और ही प्रतीत होता है। यह इसलिए ऐसा प्रतीत होता है, क्योंकि काल द्वारा यह भगवान् से पृथक् किया गया है। यह टेप रिकार्ड द्वारा अंकित उस मनुष्य की वाणी जैसा है, जो
सम्प्रति अपनी वाणी से विलग किया हुआ है। जिस तरह टेप-अंकन टेप पर स्थित है, उसी तरह सारा भौतिक जगत भौतिक शक्ति पर स्थित है और काल के द्वारा पृथक् प्रतीत होता है। इसलिए भौतिक अभिव्यक्ति परमेश्वर की वस्तुगत अभिव्यक्ति है और उनके निर्विशेष रूप को प्रदर्शित करती है, जो निर्विशेष दार्शनिकों द्वारा इतनी अधिक पूजित है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥