श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 10: सृष्टि के विभाग  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक
सर्गो नवविधस्तस्य प्राकृतो वैकृतस्तु य: ।
कालद्रव्यगुणैरस्य त्रिविध: प्रतिसंक्रम: ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
सर्ग:—सृष्टि; नव-विध:—नौ भिन्न-भिन्न प्रकार की; तस्य—इसका; प्राकृत:—भौतिक; वैकृत:—प्रकृति के गुणों द्वारा; तु— लेकिन; य:—जो; काल—नित्यकाल; द्रव्य—पदार्थ; गुणै:—गुणों के द्वारा; अस्य—इसके; त्रि-विध:—तीन प्रकार; प्रतिसङ्क्रम:—संहार ।.
 
अनुवाद
 
 उस एक सृष्टि के अतिरिक्त जो गुणों की अन्योन्य क्रियाओं के फलस्वरूप स्वाभाविक रूप से घटित होती है नौ प्रकार की अन्य सृष्टियाँ भी हैं। नित्य काल, भौतिक तत्त्वों तथा मनुष्य के कार्य के गुण के कारण प्रलय तीन प्रकार का है।
 
तात्पर्य
 नियमबद्ध सृजन तथा संहार परमेच्छा के रूप में होते हैं। भौतिक तत्त्वों की अन्योन्य क्रियाओं से अन्य सृष्टियाँ भी होती हैं, जो ब्रह्मा की बुद्धि के द्वारा घटित होती हैं। बाद में इनकी विशद व्याख्या की जायेगी। सम्प्रति, केवल प्रारम्भिक जानकारी दी गई है। तीन प्रकार के प्रलय के कारण हैं (१) सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के प्रलय के निर्धारित काल के कारण (२) अनन्त के मुख से निकलने वाली अग्नि के कारण तथा (३) मनुष्य के गुणात्मक कार्य-कारणों के फलस्वरूप।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥