श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 10: सृष्टि के विभाग  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
आद्यस्तु महत: सर्गो गुणवैषम्यमात्मन: ।
द्वितीयस्त्वहमो यत्र द्रव्यज्ञानक्रियोदय: ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
आद्य:—प्रथम; तु—लेकिन; महत:—भगवान् से पूर्ण उद्भास की; सर्ग:—सृष्टि; गुण-वैषम्यम्—भौतिक गुणों की अन्योन्य क्रिया; आत्मन:—ब्रह्म का; द्वितीय:—दूसरी; तु—लेकिन; अहम:—मिथ्या अहंकार; यत्र—जिसमें; द्रव्य—भौतिक घटक; ज्ञान—भौतिक ज्ञान; क्रिया-उदय:—कार्य की जागृति ।.
 
अनुवाद
 
 नौ सृष्टियों में से पहली सृष्टि महत् तत्त्वसृष्टि अर्थात् भौतिक घटकों की समग्रता है, जिसमें परमेश्वर की उपस्थिति के कारण गुणों में परस्पर क्रिया होती है। द्वितीय सृष्टि में मिथ्या अहंकार उत्पन्न होता है, जिसमें से भौतिक घटक, भौतिक ज्ञान तथा भौतिक कार्यकलाप प्रकट होते हैं।
 
तात्पर्य
 भौतिक सृष्टि के लिए परमेश्वर से जो पहला उद्भास होता है, वह महत्-तत्त्व कहलाता है। भौतिक गुणों की अन्योन्य क्रिया मिथ्या स्वरूप का कारण है या कि इस भाव का कि जीव भौतिक तत्त्वों से बना है। यह मिथ्या अहंकार आत्मा के साथ शरीर तथा मन की पहचान करने का कारण है। भौतिक संसाधन तथा कार्य करने की क्षमता
एवं ज्ञान की उत्पत्ति सृष्टि के दूसरे चरण में होती है, अर्थात् महत्तत्त्व के बाद। ज्ञान सूचक है इन्द्रियों का, जो ज्ञान एवं इन्द्रियों के अधिष्ठाता देवों की साधन हैं। कर्म के अन्तर्गत कर्मेन्द्रियाँ तथा उनके अधिष्ठाता देव आते हैं। ये सब द्वितीय सृष्टि में उत्पन्न होते हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥