श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 10: सृष्टि के विभाग  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
वैकारिको देवसर्ग: पञ्चमो यन्मयं मन: ।
पष्ठस्तु तमस: सर्गो यस्त्वबुद्धिकृत: प्रभो: ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
वैकारिक:—सतोगुण की अन्योन्य क्रिया; देव—देवता या अधिष्ठाता देव; सर्ग:—सृष्टि; पञ्चम:—पाँचवीं; यत्—जो; मयम्— सम्पूर्णता; मन:—मन; षष्ठ:—छठी; तु—लेकिन; तमस:—तमोगुण की; सर्ग:—सृष्टि; य:—जो; तु—अनुपूरक; अबुद्धि- कृत:—मूर्ख बनाई गई; प्रभो:—स्वामी की ।.
 
अनुवाद
 
 पाँचवीं सृष्टि सतोगुण की अन्योन्य क्रिया द्वारा बने अधिष्ठाता देवों की है, जिसका सार समाहार मन है। छठी सृष्टि जीव के अज्ञानतापूर्ण अंधकार की है, जिससे स्वामी मूर्ख की तरह कार्य करता है।
 
तात्पर्य
 उच्चलोकों के देवता देव कहलाते हैं, क्योंकि वे सब भगवान् विष्णु के भक्त हैं। विष्णु भक्त: स्मृतो दैव आसुरस्तद्विपर्यय:—विष्णु के सारे भक्त देव हैं, जबकि अन्य सारे असुर हैं। यह देवों तथा असुरों का विभाजन है। देव भौतिक प्रकृति में सतोगुणी होते हैं जबकि असुर रजो या तमोगुणी होते हैं। देवताओं या अधिष्ठाता देवों को भौतिक जगत के विभिन्न कार्यों की विभागीय व्यवस्था सौंपी हुई है। उदाहरणार्थ, हमारी इन्द्रियों में से एक इन्द्रिय आँख प्रकाश द्वारा नियंत्रित है, यह प्रकाश सूर्य की किरणों द्वारा वितरित होता है और उनका अधिष्ठाता देव सूर्य है। इसी तरह मन चन्द्रमा द्वारा नियंत्रित होता है। अन्य सारी इन्द्रियाँ—कर्मेन्द्रियाँ तथा ज्ञानेन्द्रियाँ—विभिन्न देवताओं द्वारा नियंत्रित की जाती हैं। देवतागण भौतिक मामलों की व्यवस्था में भगवान् के सहायक हैं।

देवताओं की सृष्टि के बाद सारे जीव अज्ञान के अंधकार से प्रच्छन्न रहते हैं। भौतिक जगत का प्रत्येक जीव भौतिक प्रकृति के संसाधनों पर प्रभुत्व जताने की अपनी प्रवृत्ति से बद्ध है। यद्यपि जीव भौतिक जगत का स्वामी नहीं है, किन्तु वह अज्ञान से, भौतिक वस्तुओं के स्वामी होने की मिथ्या भावना से बद्ध है।

भगवान् की अविद्या नामक शक्ति बद्धजीवों को मोहग्रस्त बनाने वाली है। भौतिक प्रकृति अविद्या कहलाती है, किन्तु भगवद्भक्ति में लगे हुए भक्तों के लिए यह शक्ति विद्या अर्थात् शुद्ध ज्ञान बन जाती है। इसकी पुष्टि भगवद्गीता में हुई है। भगवान् की शक्ति महामाया से योगमाया में रूपान्तरित हो जाती है और भक्त के समक्ष अपने असली रूप में प्रकट होती है। अतएव भौतिक प्रकृति तीन चरणों में कार्य करती प्रतीत होती है—भौतिक जगत के सृजन सिद्धान्त के रूप में, अज्ञान के रूप में तथा ज्ञान के रूप में। जैसाकि पिछले श्लोक में उद्धाटित हुआ है चौथी सृष्टि में ज्ञान शक्ति भी उत्पन्न होती है। बद्धजीव मूलत: मूर्ख नहीं होते, किन्तु प्रकृति के अविद्या कार्य के प्रभाव से वे मूर्ख बना दिये जाते हैं जिससे वे सही दिशा में ज्ञान का उपयोग नहीं कर पाते।

अंधकार के प्रभाव से बद्धजीव परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को भूल जाता है और वह राग, घृणा, गर्व, अज्ञान तथा झूठी पहचान से अभिभूत हो जाता है, जो कि भौतिक बन्धन उत्पन्न करने वाले पाँच प्रकार के मोह हैं।

 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥