श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 10: सृष्टि के विभाग  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक
वैकृतास्रय एवैते देवसर्गश्च सत्तम ।
वैकारिकस्तु य: प्रोक्त: कौमारस्तूभयात्मक: ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
वैकृता:—ब्रह्मा की सृष्टियाँ; त्रय:—तीन प्रकार की; एव—निश्चय ही; एते—ये सभी; देव-सर्ग:—देवताओं का प्राकट्य; च— भी; सत्तम—हे उत्तम विदुर; वैकारिक:—प्रकृति द्वारा देवताओं की सृष्टि; तु—लेकिन; य:—जो; प्रोक्त:—पहले वर्णित; कौमार:—चारों कुमार; तु—लेकिन; उभय-आत्मक:—दोनों प्रकार (यथा वैकृत तथा प्राकृत) ।.
 
अनुवाद
 
 हे श्रेष्ठ विदुर, ये अन्तिम तीन सृष्टियाँ तथा देवताओं की सृष्टि (दसवीं सृष्टि) वैकृत सृष्टियाँ हैं, जो पूर्ववर्णित प्राकृत (प्राकृतिक) सृष्टियों से भिन्न हैं। कुमारों का प्राकट्य दोनों ही सृष्टियाँ हैं।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥