श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 10: सृष्टि के विभाग  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
सूत उवाच
एवं सञ्चोदितस्तेन क्षत्‍त्रा कौषारविर्मुनि: ।
प्रीत: प्रत्याह तान् प्रश्नान् हृदिस्थानथ भार्गव ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
सूत: उवाच—श्री सूत गोस्वामी ने कहा; एवम्—इस प्रकार; सञ्चोदित:—प्रोत्साहित हुआ; तेन—उसके द्वारा; क्षत्त्रा—विदुर से; कौषारवि:—कुषार का पुत्र; मुनि:—मुनि ने; प्रीत:—प्रसन्न होकर; प्रत्याह—उत्तर दिया; तान्—उन; प्रश्नान्—प्रश्नों के; हृदि स्थान्—अपने हृदय के भीतर से; अथ—इस प्रकार; भार्गव—हे भृगु पुत्र ।.
 
अनुवाद
 
 सूत गोस्वामी ने कहा : हे भृगुपुत्र, महर्षि मैत्रेय मुनि विदुर से इस तरह सुनकर अत्यधिक प्रोत्साहित हुए। हर वस्तु उनके हृदय में थी, अत: वे प्रश्नों का एक एक करके उत्तर देने लगे।
 
तात्पर्य
 सूत उवाच (सूत गोस्वामी ने कहा) वाक्यांश यह सूचित करता प्रतीत होता है मानो महाराज परीक्षित तथा शुकदेव गोस्वामी के बीच चल रही वार्ता में भंग हुआ हो। जब शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित से बोल रहे थे तो सूत गोस्वामी तमाम दर्शकों में से एक थे। किन्तु सूत गोस्वामी नैमिषारण्य के मुनियों से बातें कर रहे थे जिनमें शुकदेव गोस्वामी के वंशज शौनक मुख्य थे। पर इससे विवेचनगत कथाओं में विशेष अन्तर नहीं आता।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥