श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 10: सृष्टि के विभाग  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक
तपसा ह्येधमानेन विद्यया चात्मसंस्थया ।
विवृद्धविज्ञानबलो न्यपाद् वायुं सहाम्भसा ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
तपसा—तपस्या से; हि—निश्चय ही; एधमानेन—बढ़ते हुए; विद्यया—दिव्य ज्ञान द्वारा; च—भी; आत्म—आत्मा; संस्थया— आत्मस्थ; विवृद्ध—परिपक्व; विज्ञान—व्यावहारिक ज्ञान; बल:—शक्ति; न्यपात्—पी लिया; वायुम्—वायु को; सह अम्भसा—जल के सहित ।.
 
अनुवाद
 
 दीर्घकालीन तपस्या तथा आत्म-साक्षात्कार के दिव्य ज्ञान ने ब्रह्मा को व्यावहारिक ज्ञान में परिपक्व बना दिया था, अत: उन्होंने वायु को पूर्णत: जल के साथ पी लिया।
 
तात्पर्य
 अस्तित्व के लिए ब्रह्माजी का संघर्ष उस निरन्तर युद्ध का निजी उदाहरण प्रस्तुत करता है, जो इस भौतिक जगत में जीवों तथा मोहिनी शक्ति माया में चलता रहता है। ब्रह्मा से लेकर आज तक सारे जीव भौतिक प्रकृति की सेनाओं से संघर्ष करते रहे हैं। विज्ञान तथा दिव्य अनुभूति में प्रगत ज्ञान के कारण मनुष्य उस भौतिक शक्ति पर नियंत्रण पाने का प्रयास कर सकता है, जो हमारे प्रयासों के विरुद्ध कार्यशील रहती है और आधुनिक युग में तो प्रगत भौतिक वैज्ञानिक ज्ञान तथा तपस्या ने भौतिक शक्तियों को नियंत्रित करने में अद्भुत भूमिका निभाई है। किन्तु भौतिक शक्ति पर ऐसा नियंत्रण तभी सफल हो सकता है जब मनुष्य भगवान् के शरणागत हो और दिव्य प्रेमाभक्ति के भाव से उनके आदेश का पालन करे।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥