श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 10: सृष्टि के विभाग  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक
एतावाञ्जीवलोकस्य संस्थाभेद: समाहृत: ।
धर्मस्य ह्यनिमित्तस्य विपाक: परमेष्ठ्यसौ ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
एतावान्—यहाँ तक; जीव-लोकस्य—जीवों द्वारा निवसित लोकों के; संस्था-भेद:—निवास स्थान की विभिन्न स्थितियाँ; समाहृत:—पूरी तरह सम्पन्न; धर्मस्य—धर्म का; हि—निश्चय ही; अनिमित्तस्य—अहैतुकता का; विपाक:—परिपक्व अवस्था; परमेष्ठी—ब्रह्माण्ड में सर्वोच्च व्यक्ति; असौ—उस ।.
 
अनुवाद
 
 परिपक्व दिव्य ज्ञान में भगवान् की अहैतुकी भक्ति के कारण ब्रह्माजी ब्रह्माण्ड में सर्वोच्च पुरुष हैं। इसीलिए उन्होंने विभिन्न प्रकार के जीवों के निवास स्थान के लिए चौदह लोकों का सृजन किया।
 
तात्पर्य
 पमरेश्वर जीवों के समस्त गुणों के आगार हैं। भौतिक जगत में बद्धजीव उन गुणों के अंशमात्र की झलक देते हैं, इसीलिए कभी कभी वे प्रतिबिम्ब कहलाते हैं। इन प्रतिबिम्ब जीवों ने परमेश्वर के भिन्नांशों के रूप में उनके आदि गुणों के विभिन्न अनुपातों को ही उत्तराधिकार में ग्रहण किया है और इन गुणों को ग्रहण करने के अनुसार ही वे विभिन्न जीवयोनियों के रूप में प्रकट होते हैं और ब्रह्मा की योजना के अनुसार विभिन्न लोकों में स्थान पाते हैं। ब्रह्माजी तीनों जगतों—पाताललोक अर्थात् अधोलोक, भूर्लोक अर्थात् मध्यलोक तथा स्वर्गलोक अर्थात् उच्चतर लोक—के स्रष्टा हैं। इनसे भी उच्चतर लोक यथा महर्लोक, तपोलोक, सत्यलोक तथा ब्रह्मलोक प्रलयजल में विलीन नहीं होते। इसका कारण उन लोकों के निवासियों द्वारा की जाने वाली भगवान् की अहैतुकी भक्ति-मय सेवा है और इन निवासियों का अस्तित्व द्विपरार्ध काल के अन्त तक बना रहता है जब वे भौतिक जगत में जन्म-मृत्यु की शृंखला से सामान्य रूप से मुक्त कर दिये जाते हैं।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥