श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 11: परमाणु से काल की गणना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
चरम: सद्विशेषाणामनेकोऽसंयुत: सदा ।
परमाणु: स विज्ञेयो नृणामैक्यभ्रमो यत: ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय: उवाच—मैत्रेय ने कहा; चरम:—चरम; सत्—प्रभाव; विशेषाणाम्—लक्षण; अनेक:—असंख्य; असंयुत:—अमिश्रित; सदा—सदैव; परम-अणु:—परमाणु; स:—वह; विज्ञेय:—जानने योग्य; नृणाम्—मनुष्यों का; ऐक्य—एकत्व; भ्रम:—भ्रमित; यत:—जिससे ।.
 
अनुवाद
 
 भौतिक अभिव्यक्ति का अनन्तिम कण जो कि अविभाज्य है और शरीर रूप में निरुपित नहीं हुआ हो, परमाणु कहलाता है। यह सदैव अविभाज्य सत्ता के रूप में विद्यमान रहता है यहाँ तक कि समस्त स्वरूपों के विलीनीकरण (लय) के बाद भी। भौतिक देह ऐसे परमाणुओं का संयोजन ही तो है, किन्तु सामान्य मनुष्य इसे गलत ढग़ से समझता है।
 
तात्पर्य
 श्रीमद्भागवत का परमाणु सम्बन्धी विवरण परमाणुवाद के आधुनिक विज्ञान जैसा ही है। इसका और अधिक वर्णन कणाद के परमाणुवाद में पाया जाता है। आधुनिक विज्ञान में भी परमाणु को अनन्तिम अविभाज्य कण माना जाता है, जिससे यह ब्रह्माण्ड बना हुआ है। श्रीमद्भागवत ज्ञान के समस्त वर्णनों की पूर्ण पाठपुस्तक है, जिसमें परमाणुवाद भी सम्मिलित है। शाश्वत काल का क्षुद्र सूक्ष्म रूप परमाणु है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥