श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 11: परमाणु से काल की गणना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक
तयो: समुच्चयो मास: पितृणां तदहर्निशम् ।
द्वौ तावृतु: षडयनं दक्षिणं चोत्तरं दिवि ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
तयो:—उनके; समुच्चय:—योग; मास:—महीना; पितृणाम्—पित-लोकों का; तत्—वह (मास); अह:-निशम्—दिन तथा रात; द्वौ—दोनों; तौ—महीने; ऋतु:—ऋतु; षट्—छ:; अयनम्—छह महीनों में सूर्य की गति; दक्षिणम्—दक्षिणी; च—भी; उत्तरम्—उत्तरी; दिवि—स्वर्ग में ।.
 
अनुवाद
 
 दो पक्षों को मिलाकरएक मास होता है और यह अवधि पित-लोकों का पूरा एक दिन तथा रात है। ऐसे दो मास मिलकर एक ऋतु बनाते हैं और छह मास मिलकर दक्षिण से उत्तर तक सूर्य की पूर्ण गति को बनाते हैं।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥