श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 11: परमाणु से काल की गणना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक
संवत्सर: परिवत्सर इडावत्सर एव च ।
अनुवत्सरो वत्सरश्च विदुरैवं प्रभाष्यते ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
संवत्सर:—सूर्य की कक्ष्या; परिवत्सर:—बृहस्पति की प्रदक्षिणा; इडा-वत्सर:—नक्षत्रों की कक्ष्या; एव—जैसे हैं; च—भी; अनुवत्सर:—चन्द्रमा की कक्ष्या; वत्सर:—एक पंचांग वर्ष; च—भी; विदुर—हे विदुर; एवम्—इस प्रकार; प्रभाष्यते—ऐसा उनके बारे में कहा जाता है ।.
 
अनुवाद
 
 सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र तथा आकाश के तारों के पाँच भिन्न-भिन्न नाम हैं और उनमें से प्रत्येक का अपना संवत्सर है।
 
तात्पर्य
 श्रीमद्भागवत के उपर्युक्त श्लोकों में भौतिकी, रसायन विज्ञान, गणित, ज्योतिर्विज्ञान, काल तथा दिक् विषयों की चर्चा हुई है। वे उन विषयों के जिज्ञासुओं के लिए निश्चय ही अतीव रोचक हैं, किन्तु जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है हम उनकी सम्यक् व्याख्या तकनीकी ज्ञान के रूप में नहीं दे सकते। इस विषय का सारांश इस कथन द्वारा दिया गया है कि ज्ञान की विभिन्न शाखाओं के ऊपर काल का परम नियंत्रण है और यह काल भगवान् का स्वांश है। उन के बिना कुछ भी विद्यमान नहीं रह सकता; अत: हर वस्तु हमारे अल्प ज्ञान के लिए, चाहे वह कितनी ही अद्भुत क्यों न हो, भगवान् की जादुई छड़ी का करतब प्रतीत होती है। जहाँ तक काल का सम्बन्ध है हम आधुनिक घड़ी के अनुसार काल की तालिका दे रहे हैं—

एक त्रुटि — ८/१३,५०० सेकंड एक वेध — ८/१३५ सेकंड एक लव — ८/४५ सेकंड एक निमेष — ८/१५ सेकंड एक क्षण — ८/५ सेकंड एक काष्ठा — ८ सेकंड एक लघु — २ मिनट एक दण्ड — ३० मिनट एक प्रहर — ३ घंटे एक दिन — १२ घंटे एक रात — १२ घंटे एक पक्ष — १५ दिन दो पक्ष का १ मास तथा १२ मास का १ पंचांग वर्ष या सूर्य की पूरी एक कक्षा होते हैं। मनुष्य की आयु एक सौ वर्ष अनुमानित है। नित्य काल की माप को नियंत्रित करने की यही विधि है। ब्रह्म-संहिता (५.५२) में इस नियंत्रण की परिपुष्टि इस प्रकार हुई है—

यच्चक्षुरेष सविता सकलग्रहाणां राजा समस्तसुरमूर्तिरसेषतेजा:।

यस्याज्ञया भ्रमति संभृतकालचक्रो गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥

“मैं उन आदि भगवान् गोविन्द की पूजा करता हूँ जिनके नियंत्रण में भगवान् की आँख माना जाने वाला सूर्य तक नित्य काल की स्थिर कक्ष्या के भीतर चक्कर लगाता है। सूर्य समस्त लोकों का राजा है और उसमें उष्मा तथा प्रकाश की असीम शक्ति है।”

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥