श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 11: परमाणु से काल की गणना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
भगवान् वेद कालस्य गतिं भगवतो ननु ।
विश्वं विचक्षते धीरा योगराद्धेन चक्षुषा ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
भगवान्—हे आध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली; वेद—आप जानते हैं; कालस्य—नित्य काल की; गतिम्—चालें; भगवत:— भगवान् के; ननु—निश्चय ही; विश्वम्—पूरा ब्रह्माण्ड; विचक्षते—देखते हैं; धीरा:—स्वरूपसिद्ध व्यक्ति; योग-राद्धेन—योग दृष्टि के बल पर; चक्षुषा—आँखों द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 हे आध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली, आप उस नित्य काल की गतियों को समझ सकते हैं, जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का नियंत्रक स्वरूप है। चूँकि आप स्वरूपसिद्ध व्यक्ति हैं, अत: आप योग दृष्टि की शक्ति से हर वस्तु देख सकते हैं।
 
तात्पर्य
 जो योगशक्ति की सर्वोच्च सिद्धावस्था को प्राप्त कर चुके हैं और भूत, वर्तमान तथा भविष्य की हर वस्तु को देख सकते हैं, वे त्रिकालज्ञ कहलाते हैं। इसी तरह भगवद्भक्त शास्त्रों की हर वस्तु को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। श्रीकृष्ण के भक्तगण कृष्ण विज्ञान के साथ ही साथ भौतिक तथा आध्यात्मिक जगतों की स्थिति को बिना किसी कठिनाई के सरलता से समझ सकते हैं। भक्तों को किसी योगसिद्धि के लिए प्रयास नहीं करना पड़ता। वे हर एक के हृदय में आसीन भगवान् की कृपा से हर बात को समझने में सक्षम होते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥