श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 11: परमाणु से काल की गणना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुर्युगम् ।
दिव्यैर्द्वादशभिर्वर्षै: सावधानं निरूपितम् ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय: उवाच—मैत्रेय ने कहा; कृतम्—सत्ययुग; त्रेता—त्रेतायुग; द्वापरम्—द्वापरयुग; च—भी; कलि:—कलियुग; च—तथा; इति—इस प्रकार; चतु:-युगम्—चारों युग; दिव्यै:—देवताओं के; द्वादशभि:—बारह; वर्षै:—हजारों वर्ष; स-अवधानम्— लगभग; निरूपितम्—निश्चित किया गया ।.
 
अनुवाद
 
 मैत्रेय ने कहा : हे विदुर, चारों युग सत्य, त्रेता, द्वापर तथा कलि युग कहलाते हैं। इन सबों के कुल वर्षों का योग देवताओं के बारह हजार वर्षों के बराबर है।
 
तात्पर्य
 देवताओं का वर्ष मनुष्यों के ३६० वर्षों के बराबर होता है। जैसाकि आगे के श्लोकों से स्पष्ट हो जायेगा, देवताओं के १२,००० वर्ष, जिसमें संधिकाल की अवधियाँ अर्थात् युग सन्ध्याएँ सम्मिलित हैं उपर्युक्त चार युगों के योग के तुल्य हैं। इस तरह उपर्युक्त चार युगों का सम्पूर्ण योग ४,३२०,००० वर्ष है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥