श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 11: परमाणु से काल की गणना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक
स्वं स्वं कालं मनुर्भुङ्क्ते साधिकां ह्येकसप्ततिम् ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
स्वम्—अपना; स्वम्—तदनुसार; कालम्—जीवन की अवधि, आयु; मनु:—मनु; भुङ्क्ते—भोग करता है; स-अधिकाम्—की अपेक्षा कुछ अधिक; हि—निश्चय ही; एक-सप्ततिम्—इकहत्तर ।.
 
अनुवाद
 
 प्रत्येक मनु चतुर्युगों के इकहत्तर से कुछ अधिक समूहों का जीवन भोग करता है।
 
तात्पर्य
 जैसाकि विष्णु पुराण में वर्णित है मनु की आयु चतुर्युगों के इकहत्तर समूहों की होती है। एक मनु की आयु दैवी गणना के अनुसार लगभग ८,५२,००० वर्ष या मनुष्य गणना में ३०,६७,२०,००० वर्ष होती है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥