श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 11: परमाणु से काल की गणना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक
मन्वन्तरेषु मनवस्तद्वंश्या ऋषय: सुरा: ।
भवन्ति चैव युगपत्सुरेशाश्चानु ये च तान् ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
मनु-अन्तरेषु—प्रत्येक मनु के अवसान के बाद; मनव:—अन्य मनु; तत्-वंश्या:—तथा उनके वंशज; ऋषय:—सात विख्यात ऋषि; सुरा:—भगवान् के भक्त; भवन्ति—उन्नति करते हैं; च एव—वे सभी भी; युगपत्—एक साथ; सुर-ईशा:—इन्द्र जैसे देवता; च—तथा; अनु—अनुयायी; ये—समस्त; च—भी; तान्—उनको ।.
 
अनुवाद
 
 प्रत्येक मनु के अवसान के बाद क्रम से अगला मनु अपने वंशजों के साथ आता है, जो विभिन्न लोकों पर शासन करते हैं। किन्तु सात विख्यात ऋषि तथा इन्द्र जैसे देवता एवं गन्धर्व जैसे उनके अनुयायी मनु के साथ साथ प्रकट होते हैं।
 
तात्पर्य
 ब्रह्मा के एक दिन में चौदह मनु होते हैं और इनमें से हर एक के पृथक्-पृथक् वंशज होते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥