श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 11: परमाणु से काल की गणना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक
एष दैनन्दिन: सर्गो ब्राह्मस्त्रैलोक्यवर्तन: ।
तिर्यङ्‌नृपितृदेवानां सम्भवो यत्र कर्मभि: ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
एष:—ये सारी सृष्टियाँ; दैनम्-दिन:—प्रतिदिन; सर्ग:—सृष्टि; ब्राह्म:—ब्रह्मा के दिनों के रूप में; त्रैलोक्य-वर्तन:—तीनों लोकों का चक्कर; तिर्यक्—मनुष्येतर पशु; नृ—मनुष्य; पितृ—पितृलोक के; देवानाम्—देवताओं के; सम्भव:—प्राकट्य; यत्र— जिसमें; कर्मभि:—सकाम कर्मों के चक्र में ।.
 
अनुवाद
 
 ब्रह्मा के दिन के समय सृष्टि में तीनों लोक—स्वर्ग, मर्त्य तथा पाताल लोक—चक्कर लगाते हैं तथा मनुष्येतर पशु, मनुष्य, देवता तथा पितृगण समेत सारे निवासी अपने अपने सकाम कर्मों के अनुसार प्रकट तथा अप्रकट होते रहते हैं।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥