श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 11: परमाणु से काल की गणना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक
तमेवान्वपिधीयन्ते लोको भूरादयस्त्रय: ।
निशायामनुवृत्तायां निर्मुक्तशशिभास्करम् ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
तम्—वह; एव—निश्चय ही; अनु—पीछे; अपि धीयन्ते—दृष्टि से लुप्त हो जाते हैं; लोका:—लोक; भू:-आदय:—तीनों लोक, भू:, भुव: तथा स्व:; त्रय:—तीन; निशायाम्—रात में; अनुवृत्तायाम्—सामान्य; निर्मुक्त—बिना चमक दमक के; शशि— चन्द्रमा; भास्करम्—सूर्य ।.
 
अनुवाद
 
 जब ब्रह्मा की रात शुरू होती है, तो तीनों लोक दृष्टिगोचर नहीं होते और सूर्य तथा चन्द्रमा तेज विहीन हो जाते हैं जिस तरह कि सामान्य रात के समय होता है।
 
तात्पर्य
 ऐसा समझा जाता है कि सूर्य तथा चन्द्रमा की चमक तीनों लोकों की परिधि से अदृश्य हो जाती है, किन्तु स्वयं सूर्य तथा चन्द्रमा लुप्त नहीं होते। वे ब्रह्माण्ड के शेष भाग में, जो तीनों लोकों के मंडल से परे है, प्रकट होते हैं। प्रलयग्रस्त भाग सूर्य की किरणों या चन्द्रमा की चमक के बिना रह जाता है। सर्वत्र अंधकार रहता है और जल भरा रहता है और न रुकने वाली वायु चलती है जैसाकि अगले श्लोकों में बतलाया गया है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥