श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 11: परमाणु से काल की गणना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक
पूर्वस्यादौ परार्धस्य ब्राह्मो नाम महानभूत् ।
कल्पो यत्राभवद्ब्रह्मा शब्दब्रह्मेति यं विदु: ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
पूर्वस्य—प्रथमार्ध के; आदौ—प्रारम्भ में; पर-अर्धस्य—द्वितीयार्ध का; ब्राह्म:—ब्राह्म-कल्प; नाम—नामक; महान्—महान्; अभूत्—प्रकट था; कल्प:—कल्प; यत्र—जहाँ; अभवत्—प्रकट हुआ; ब्रह्मा—ब्रह्मा; शब्द-ब्रह्म इति—वेदों की ध्वनियाँ; यम्—जिसको; विदु:—वे जानते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 ब्रह्मा के जीवन के प्रथमार्ध के प्रारम्भ में ब्राह्म-कल्प नामक कल्प था जिसमें ब्रह्माजी उत्पन्न हुए। वेदों का जन्म ब्रह्मा के जन्म के साथ साथ हुआ।
 
तात्पर्य
 पद्मपुराण (प्रभास काण्ड) के अनुसार ब्रह्मा के तीस दिनों में कई कल्प यथा वराह कल्प तथा पितृकल्प घटित हो जाते हैं। तीस दिन का ब्रह्मा का एक मास होता है, जो पूर्ण चन्द्रमा से लेकर चन्द्रमा के अस्त होने तक चलता है। ऐसे बारह मासों से पूरा वर्ष बनता है और पचास वर्ष एक परार्ध को पूरा करते हैं, अर्थात् ब्रह्मा की आयु के आधे के तुल्य होते हैं। भगवान् का श्वेत वराह प्राकट्य ब्रह्मा का पहला जन्मदिन है। ब्रह्मा की जन्मतिथि हिन्दू ज्योतिष गणना के अनुसार मार्च मास में पड़ती है। यह कथन श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर की व्याख्या से जैसे का तैसा उद्धृत है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥