श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 11: परमाणु से काल की गणना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक
अयं तु कथित: कल्पो द्वितीयस्यापि भारत ।
वाराह इति विख्यातो यत्रासीच्छूकरो हरि: ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
अयम्—यह; तु—लेकिन; कथित:—प्रसिद्ध; कल्प:—चालू कल्प; द्वितीयस्य—परार्ध का; अपि—निश्चय ही; भारत—हे भरतवंशी; वाराह:—वाराह; इति—इस प्रकार; विख्यात:—प्रसिद्ध है; यत्र—जिसमें; आसीत्—प्रकट हुआ; शूकर:—सूकर का रूप; हरि:—भगवान् ।.
 
अनुवाद
 
 हे भरतवंशी, ब्रह्मा के जीवन के द्वितीयार्ध में प्रथम कल्प वाराह कल्प भी कहलाता है, क्योंकि उस कल्प में भगवान् सूकर अवतार के रूप में प्रकट हुए थे।
 
तात्पर्य
 ब्राह्म, पाद्म तथा वाराह कल्प नामक विभिन्न कल्प अभिज्ञ व्यक्ति को कुछ चक्कर में डालने वाले लगते हैं। कुछ ऐसे विद्वान हैं, जो इन कल्पों को एक ही मानते हैं। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार ब्राह्म-कल्प प्रथमार्ध के प्रारम्भ में पाद्म-कल्प जैसा प्रतीत होता है। किन्तु हम तो मूल पाठ का पालन कर सकते हैं और यह समझ सकते हैं कि वर्तमान कल्प ब्रह्मा की आयु की अवधि के द्वितीयार्ध में है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥