श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 11: परमाणु से काल की गणना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक
स काल: परमाणुर्वै यो भुङ्क्ते परमाणुताम् ।
सतोऽविशेषभुग्यस्तु स काल: परमो महान् ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह; काल:—नित्यकाल; परम-अणु:—पारमाणविक; वै—निश्चय ही; य:—जो; भुङ्क्ते—गुजरता है; परम-अणुताम्— एक परमाणु का अवकाश; सत:—सम्पूर्ण समुच्चय; अविशेष-भुक्—अद्वैत प्रदर्शन से गुजरने वाला; य: तु—जो; स:—वह; काल:—काल; परम:—परम; महान्—महान् ।.
 
अनुवाद
 
 परमाणु काल का मापन परमाणु के अवकाश विशेष को तय कर पाने के अनुसार किया जाता है। वह काल जो परमाणुओं के अव्यक्त समुच्चय को प्रच्छन्न करता है महाकाल कहलाता है।
 
तात्पर्य
 काल तथा अवकाश (दिक्) दो सहसम्बन्धी पद हैं। अणुओं के कतिपय अवकाश को तय करने के रूप में काल मापा जाता है। मानक काल की गणना सूर्य की गति के अनुसार की जाती है। एक परमाणु को पार करने में सूर्य जितना काल लेता है, वह परमाणु-काल के रूप में परिगणित किया जाता है। सबसे महान् काल अद्वैत अभिव्यक्ति के समग्र अस्तित्व को व्याप्त करता है। सारे ग्रह चक्कर लगाते हैं और आकाश को तय करते हैं और अवकाश परमाणुओं के रूप में परिगणित किया जाता है। प्रत्येक ग्रह की चक्कर लगाने की अपनी विशिष्ट कक्ष्या होती है, जिसमें वह बिना इधर-उधर हटे गति करता है। इसी तरह सूर्य की अपनी कक्ष्या है। प्रकृति के सृजन, पालन तथा संहार के काल की सम्पूर्ण गणना समस्त ग्रहों की गति की गणना के आधार पर तब तक की जाती है जब तक कि सृष्टि का अन्त नहीं हो जाता। इसे परमकाल कहते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥