श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 11: परमाणु से काल की गणना  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक
दशोत्तराधिकैर्यत्र प्रविष्ट: परमाणुवत् ।
लक्ष्यतेऽन्तर्गताश्चान्ये कोटिशो ह्यण्डराशय: ॥ ४१ ॥
 
शब्दार्थ
दश-उत्तर-अधिकै:—दस गुनी अधिक मोटाई वाली; यत्र—जिसमें; प्रविष्ट:—प्रविष्ट; परम-अणु-वत्—परमाणुओं की तरह; लक्ष्यते—(ब्रह्माण्डों का भार) प्रतीत होता है; अन्त:-गता:—एकसाथ रहते हैं; च—तथा; अन्ये—अन्य में; कोटिश:— संपुंजित; हि—क्योंकि; अण्ड-राशय:—ब्रह्माण्डों के विशाल संयोग ।.
 
अनुवाद
 
 ब्रह्माण्डों को ढके रखने वाले तत्त्वों की परतें पिछले वाली से दस गुनी अधिक मोटी होती हैं और सारे ब्रह्माण्ड एकसाथ संपुंजित होकर परमाणुओं के विशाल संयोग जैसे प्रतीत होते हैं।
 
तात्पर्य
 ब्रह्माण्डों के आवरण (कोश) भी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश के तत्त्वों से बने होते हैं और अपने से पहले वाले आवरण की अपेक्षा दसगुना मोटे होते हैं। ब्रह्माण्ड का पहला आवरण पृथ्वी है और यह ब्रह्माण्ड से दस गुना मोटी है। यदि ब्रह्माण्ड ४ अरब मील आकार का है, तो पृथ्वी के आवरण का आकार चार गुणा दस अर्थात् ४० अरब मील है। जल का आवरण पृथ्वी के आवरण से दसगुना मोटा है। और अग्नि का आवरण, जल के आवरण से दसगुना अधिक है। वायु का आवरण अग्नि के आवरण का दस गुना और आकाश का आवरण अग्नि से दस गुना होता है। यह ब्रह्माण्ड पदार्थ के आवरणों के भीतर आवरणों की तुलना में परमाणु जैसा प्रतीत होता है और ब्रह्माण्डों की संख्या उन लोगों को भी ज्ञात नहीं है, जो ब्रह्माण्डों के आवरणों का अनुमान लगा सकते हैं।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥