श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 11: परमाणु से काल की गणना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक
तदाहुरक्षरं ब्रह्म सर्वकारणकारणम् ।
विष्णोर्धाम परं साक्षात्पुरुषस्य महात्मन: ॥ ४२ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—वह; आहु:—कहा जाता है; अक्षरम्—अच्युत; ब्रह्म—परम; सर्व-कारण—समस्त कारणों का; कारणम्—परम कारण; विष्णो: धाम—विष्णु का आध्यात्मिक निवास; परम्—परम; साक्षात्—निस्सन्देह; पुरुषस्य—पुरुष अवतार का; महात्मन:— महाविष्णु का ।.
 
अनुवाद
 
 इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण समस्त कारणों के आदि कारण कहलाते हैं। इस प्रकार विष्णु का आध्यात्मिक धाम निस्सन्देह शाश्वत है और यह समस्त अभिव्यक्तियों के उद्गम महाविष्णु का भी धाम है।
 
तात्पर्य
 महाविष्णु जो कि कारणार्णव में योगनिद्रा में शयन करते हैं और अपनी श्वास के द्वारा असंख्य ब्रह्माण्डों को उत्पन्न करते हैं, भौतिक जगतों की क्षणिक अभिव्यक्ति के लिए महत् तत्त्व में क्षण भर के लिए ही प्रकट होते हैं। वे भगवान् श्रीकृष्ण के स्वांश हैं और इस तरह भगवान् कृष्ण से अभिन्न होकर भी भौतिक जगत में अवतार के रूप में उनका वैधानिक प्राकट्य अस्थायी है। भगवान् का आदि रूप वस्तुत: स्वरूप या असली रूप है और वे वैकुण्ठ जगत (विष्णुलोक) में नित्य वास करते हैं। यहाँ पर प्रयुक्त महात्-मन: शब्द महाविष्णु को सूचित करने के लिए आया है और उनका असली स्वरूप भगवान् कृष्ण है, जो परम कहलाते हैं जिसकी पुष्टि ब्रह्म-संहिता में हुई है : ईश्वर: परम: कृष्ण: सच्चिदानन्दविग्रह:।

अनादिरादिर्गोविन्द: सर्वकारणकारणम् ॥

“परमेश्वर अर्थात् आदि भगवान् कृष्ण हैं, जो गोविन्द कहलाते हैं। उनका रूप शाश्वत, आनन्दमय तथा ज्ञानमय है और वे समस्त कारणों के आदि कारण हैं।”

 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध के अन्तर्गत “परमाणु से काल की गणना” नामक ग्यारहवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥